नवी पिल्लई पर लेख से ‘जन्मभूमि’ में विवाद, कश्मीर पर रुख को लेकर उठे सवाल
Article on Navi Pillay sparks controversy in ‘Janmabhumi’; questions raised over stance on Kashmir.

मलप्पुरम: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की विचारधारा से जुड़े मलयालम दैनिक ‘जन्मभूमि’ में दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद नवी पिल्लई की उपलब्धियों की प्रशंसा में प्रकाशित लेख को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। राजनीतिक विश्लेषक ए. हरिकुमार ने अखबार के संपादकीय रुख पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि लेख में पिल्लई के मानवाधिकार संबंधी कार्यों को प्रमुखता दी गई, जबकि कश्मीर और भारत की नीतियों पर उनके विचारों का पर्याप्त उल्लेख नहीं किया गया।

यह लेख पी. श्रीकुमार ने लिखा है, जो केरल के राज्यपाल के अतिरिक्त निजी सचिव रह चुके हैं और ‘जन्मभूमि’ से जुड़े पूर्व वरिष्ठ पत्रकार हैं। हरिकुमार ने सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पिल्लई के अंतरराष्ट्रीय योगदान की सराहना करते समय भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े मुद्दों पर उनके रुख का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

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नवी पिल्लई ने 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में कार्य किया था। हरिकुमार का आरोप है कि इस दौरान कश्मीर के मुद्दे पर उनके कार्यालय की सक्रियता भारत के स्थापित रुख से अलग थी। भारत लंबे समय से जम्मू-कश्मीर से जुड़े विवादों को पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बातचीत के जरिए सुलझाने की वकालत करता रहा है और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का विरोध करता रहा है।

हरिकुमार ने कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि मानवाधिकारों के आकलन में हिंसा और संघर्ष के कारण प्रभावित सभी समुदायों की पीड़ा को समान रूप से महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाने और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर पिल्लई के विचारों तथा इजरायल को भारत के हथियार निर्यात पर उनकी आपत्तियों का भी उल्लेख किया।

पिल्लई वर्ष 2021 से 2025 तक कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्रों और इजरायल पर संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की अध्यक्ष रही थीं। गाजा में इजरायल की कार्रवाई को लेकर आयोग के निष्कर्षों पर इजरायल ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इन मामलों ने अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकारों और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर बहस को तेज किया है।

पिल्लई को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की घोषणा के बाद उनके अंतरराष्ट्रीय योगदान और विवादित मुद्दों पर उनके रुख को लेकर चर्चा बढ़ी है। हरिकुमार ने सवाल उठाया कि क्या प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान किसी सार्वजनिक व्यक्ति के विचारों और कार्यों की आलोचनात्मक समीक्षा को रोक सकता है।

यह विवाद मानवाधिकारों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी और राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच संतुलन को लेकर जारी व्यापक बहस को भी सामने लाता है। जहां मानवाधिकार समर्थक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच को जवाबदेही के लिए जरूरी मानते हैं, वहीं आलोचक ऐसे मामलों में राष्ट्रीय संप्रभुता और संबंधित देशों की आपत्तियों को महत्व देने की मांग करते हैं।