अलवर: राजस्थान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, पूर्व विधायक और सहकारिता आंदोलन के प्रमुख स्तंभ महेंद्र शास्त्री का गुरुवार सुबह 95 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उन्होंने अलवर के मोती डूंगरी स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से राजनीतिक, सामाजिक और सहकारिता क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
महेंद्र शास्त्री का जन्म 27 अप्रैल 1932 को अलवर जिले के बम्बोरा गांव में हुआ था। उन्होंने बीए, एलएलबी, शास्त्री और साहित्यरत्न की शिक्षा हासिल की। वर्ष 1985 में आठवीं राजस्थान विधानसभा के चुनाव में वह लोकदल के टिकट पर मुंडावर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए और 1990 तक इस पद पर रहे। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की और पार्टी में विभिन्न महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।
शास्त्री की पहचान केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि राजस्थान के सहकारिता आंदोलन के मजबूत स्तंभ के तौर पर भी रही। उन्होंने राजस्थान राज्य सहकारी संघ के अध्यक्ष, अलवर केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष, कृषि उपज मंडी समिति अलवर के अध्यक्ष, क्रय-विक्रय सहकारी समिति के अध्यक्ष और पंचायत समिति मुंडावर के प्रधान सहित कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।
सहकारिता क्षेत्र में उनके लंबे योगदान और सक्रिय भूमिका के कारण उन्हें इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में गिना जाता था। उनका राजनीतिक और सामाजिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। उनके जीवन पर लिखे गए संस्मरण में उनकी संघर्षपूर्ण यात्रा को ‘शिव-जटाओं सी उलझी जीवन-गाथा’ के रूप में वर्णित किया गया है।
महेंद्र शास्त्री का साहित्य से भी गहरा जुड़ाव था। उनकी काव्य कृति ‘गा ले कोई गीत’ प्रकाशित हुई, जबकि उनका संस्मरण ‘यादों की महक’ भी सामने आया। इसके अलावा उनकी दो काव्य कृतियां और तीन गद्य पुस्तकें अप्रकाशित बताई गई हैं।
महेंद्र शास्त्री के निधन से अलवर ने राजनीति, समाज और सहकारिता के क्षेत्र में लंबे समय तक सक्रिय रहे एक वरिष्ठ व्यक्तित्व को खो दिया है। उनके निधन पर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक वर्गों में शोक व्यक्त किया जा रहा है।







