ड्यूटी के वक्त थाना परिसर में नहीं दिखे पुलिसकर्मी, बढ़ते साइबर अपराध के बीच पुलिसिंग की व्यवस्था पर गंभीर सवाल
रिपोर्ट: प्रज्ञा पांडे | पटना
पटना: रविवार की सुबह आमतौर पर शहर के लिए सुकून का दिन होती है, लेकिन साइबर अपराध के शिकार लोगों के लिए हर दिन एक जैसी चिंता लेकर आता है। किसी के बैंक खाते से पैसे उड़ जाते हैं, किसी को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगा जाता है, तो कोई ऑनलाइन निवेश के लालच में अपनी जमा-पूंजी गंवा बैठता है। ऐसे में पीड़ित की सबसे बड़ी उम्मीद होती है—पुलिस। लेकिन राजधानी पटना में साइबर अपराध से लड़ने के लिए बनाए गए साइबर थाना की व्यवस्था को लेकर सामने आई तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। बारह बजे तक लेट नहीं, दो बजे के बाद भेंट नहीं…” कभी सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली पर तंज कसने के लिए कही जाने वाली यह कहावत अब पटना के साइबर थाना की व्यवस्था पर सवाल उठाती नजर आ रही है। एक तरफ साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहा है। पुलिस मुख्यालय से लेकर सरकार तक साइबर क्राइम पर लगाम लगाने और लोगों को जागरूक करने की बात कर रही है। दूसरी तरफ जब साइबर थाना की जमीनी व्यवस्था का जायजा लिया गया, तो थाना परिसर में सन्नाटा नजर आया। ड्यूटी के समय एक भी पुलिस पदाधिकारी या पुलिसकर्मी नजर नहीं आया।
थाना है, लेकिन ड्यूटी पर कौन?
जिस जगह साइबर अपराध का शिकार व्यक्ति अपनी शिकायत लेकर पहुंचता है, उसी जगह अगर ड्यूटी के समय पुलिसकर्मी दिखाई न दें, तो सवाल उठना लाजिमी है। थाना परिसर के कमरों में सन्नाटा और मौके पर पुलिसकर्मियों की गैरमौजूदगी ने व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए। सोचिए अगर किसी व्यक्ति के खाते से अभी-अभी लाखों रुपये की रकम निकल गई हो और वह मदद की उम्मीद में साइबर थाना पहुंचे, लेकिन वहां उसे कोई पुलिसकर्मी ही नहीं मिले, तो उसकी स्थिति क्या होगी?
वह अपनी शिकायत किससे करेगा?
उसकी बात कौन सुनेगा? और सबसे महत्वपूर्ण—तत्काल कार्रवाई कौन करेगा? साइबर अपराध में समय ही सबसे अहम साइबर ठगी के मामलों में शुरुआती समय काफी महत्वपूर्ण हो सकता है। पीड़ित जितनी जल्दी शिकायत करता है, उतनी जल्दी संबंधित बैंकिंग लेनदेन और अन्य डिजिटल माध्यमों पर कार्रवाई की संभावना बनती है। ऐसे में साइबर थाना की भूमिका सिर्फ शिकायत दर्ज करने तक सीमित नहीं है। यहां आने वाले पीड़ितों को तत्काल मार्गदर्शन और आवश्यक पुलिस कार्रवाई की जरूरत होती है। लेकिन अगर ड्यूटी के समय थाना में ही जिम्मेदार पुलिसकर्मी मौजूद न हों, तो आम लोगों के मन में पुलिस व्यवस्था को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
लापरवाही है या कोई दूसरी वजह?
हालांकि पुलिसकर्मियों के थाना परिसर में मौजूद नहीं रहने के पीछे कोई आधिकारिक कारण था या यह ड्यूटी में लापरवाही का मामला है, इसकी स्थिति संबंधित अधिकारियों के स्पष्टीकरण और जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। लेकिन सवाल यह भी है कि अगर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी किसी सरकारी या विभागीय काम से बाहर थे, तो क्या थाना में वैकल्पिक व्यवस्था थी? क्या कोई जिम्मेदार अधिकारी उस समय शिकायत सुनने के लिए मौजूद था? अगर नहीं, तो यह व्यवस्था किसके भरोसे चल रही थी?
जब अपराधी ऑनलाइन, तो पुलिसिंग भी होनी चाहिए हाईटेक
आज अपराध का तरीका बदल चुका है। अपराधी मोबाइल और इंटरनेट के जरिए घर बैठे लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। ऐसे अपराधों से निपटने के लिए पुलिसिंग भी उसी रफ्तार से मजबूत करनी होगी। साइबर थाना ऐसा स्थान है जहां आम आदमी को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी शिकायत तत्काल सुनी जाएगी और कार्रवाई शुरू होगी। लेकिन राजधानी के साइबर थाना की सामने आई तस्वीर अगर वास्तविक स्थिति को दर्शाती है, तो यह केवल एक थाना की समस्या नहीं बल्कि साइबर अपराध के खिलाफ हमारी तैयारी पर भी सवाल है।
सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदारी किसकी?
बढ़ते साइबर अपराध के बीच अगर किसी साइबर थाना में ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मी मौजूद नहीं मिलते हैं, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
आखिर ड्यूटी पर तैनात पुलिस पदाधिकारी और कर्मी कहां थे?
क्या उनकी गैरमौजूदगी की कोई आधिकारिक वजह थी? अगर वे ड्यूटी से अनुपस्थित थे, तो क्या विभागीय कार्रवाई होगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या साइबर अपराध से जूझ रहे आम लोगों को इसी तरह भगवान भरोसे छोड़ दिया जाएगा?
Sunday Special का सवाल
साइबर अपराधियों के पास तकनीक है, नेटवर्क है और लोगों को ठगने के नए-नए तरीके हैं। ऐसे में पुलिस के पास सबसे बड़ी ताकत है—तत्परता और भरोसा। अगर थाना का दरवाजा पीड़ित के लिए खुला है, तो उसके अंदर पुलिस की मौजूदगी भी सुनिश्चित होनी चाहिए। पटना के साइबर थाना की यह तस्वीर अब पुलिस विभाग के आला अधिकारियों के सामने कई सवाल छोड़ रही है।
अब देखना होगा कि इस मामले को लेकर पुलिस विभाग क्या संज्ञान लेता है और अगर ड्यूटी में लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदार पुलिस पदाधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जाती है।







