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जहां जिंदगी बचाने की जद्दोजहद होती है, वहीं छा गया अंधेरा….फिर क्या ? मोबाइल की टॉर्च में हुआ मरीजों का इलाज

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Where life is being saved, darkness descends...and then what? Patients are treated using a mobile phone torch.

रोहतास: अस्पताल सिर्फ ईंट-पत्थरों से बनी कोई इमारत नहीं होता। यह वह जगह है, जहां किसी परिवार की आखिरी उम्मीद सांस लेती है। किसी मां की आंखों में अपने बच्चे के ठीक होने की उम्मीद होती है, किसी बुजुर्ग के परिजन बेहतर इलाज की आस लगाए बैठे होते हैं और किसी गंभीर मरीज के लिए अस्पताल की हर सुविधा जिंदगी और मौत के बीच का फर्क तय कर सकती है। ऐसे में अस्पताल की इमरजेंसी में रोशनी का महत्व समझना मुश्किल नहीं। लेकिन सासाराम सदर अस्पताल के मॉडल हॉस्पिटल से सामने आई तस्वीरें इस बुनियादी जरूरत को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। बिजली गुल हुई तो इमरजेंसी वार्ड में अंधेरा छा गया और मरीजों के इलाज के लिए मोबाइल फोन की टॉर्च का सहारा लेना पड़ा। डॉक्टर इलाज करते रहे, स्वास्थ्यकर्मी अपनी जिम्मेदारी निभाते रहे और आसपास मौजूद लोग मोबाइल की रोशनी से इलाज की प्रक्रिया को आसान बनाने की कोशिश करते नजर आए।

यह तस्वीर पहली नजर में बिजली कटने की एक सामान्य घटना लग सकती है, लेकिन जब यही घटना अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में घटे, तो इसका अर्थ बदल जाता है। इमरजेंसी में आने वाला मरीज इंतजार नहीं कर सकता। वहां हर क्षण महत्वपूर्ण होता है और हर सुविधा का तत्काल उपलब्ध होना जरूरी है। ऐसे में पर्याप्त रोशनी के अभाव में चिकित्सा प्रक्रिया का प्रभावित होना स्वाभाविक चिंता का विषय है।

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सवाल बिजली जाने का नहीं, व्यवस्था के तैयार रहने का है

किसी भी अस्पताल में बिजली का जाना असंभव नहीं है। तकनीकी खराबी, ग्रिड की समस्या या किसी अन्य कारण से बिजली आपूर्ति बाधित हो सकती है। लेकिन आधुनिक अस्पताल व्यवस्था की असली कसौटी यह है कि बिजली जाने के बाद कितनी जल्दी वैकल्पिक व्यवस्था सक्रिय होती है। सासाराम सदर अस्पताल में निर्बाध बिजली आपूर्ति के लिए अलग ट्रांसफार्मर की व्यवस्था होने की बात सामने आती है। इसके अलावा बिजली कटने की स्थिति में अस्पताल की सेवाएं प्रभावित न हों, इसके लिए जनरेटर समेत अन्य वैकल्पिक व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं।
ऐसे में सवाल और गंभीर हो जाता है—जब बैकअप की व्यवस्था है, तो इमरजेंसी में अंधेरा क्यों हुआ?
क्या जनरेटर तत्काल शुरू नहीं हुआ? क्या बैकअप सिस्टम में तकनीकी खराबी थी? क्या बिजली आपूर्ति बाधित होने और वैकल्पिक व्यवस्था शुरू होने के बीच इतना अंतर था कि मरीजों को मोबाइल की रोशनी का सहारा लेना पड़ा? इन सवालों का जवाब केवल एक घटना की वजह तलाशने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए जरूरी है।

इमरजेंसी वार्ड में रोशनी सुविधा नहीं, आवश्यकता है

चिकित्सा व्यवस्था में रोशनी को महज एक सामान्य सुविधा मानना उचित नहीं होगा। मरीज की जांच से लेकर दवा देने, इंजेक्शन लगाने, चोट देखने और गंभीर स्थिति में तत्काल चिकित्सकीय निर्णय लेने तक पर्याप्त प्रकाश जरूरी है। खासकर रात के समय इमरजेंसी में पहुंचने वाले मरीजों के लिए अस्पताल की विद्युत व्यवस्था पर भरोसा ही उनकी सुरक्षा का एक हिस्सा है। ऐसे में मोबाइल फोन की टॉर्च में इलाज होते देखना निश्चित रूप से असहज करने वाली तस्वीर है। डॉक्टरों ने उपलब्ध परिस्थितियों में इलाज जारी रखा, लेकिन सवाल उन व्यवस्थाओं का है जो डॉक्टरों और मरीजों को ऐसी स्थिति से बचाने के लिए बनाई गई हैं।

सदर अस्पताल पर हजारों मरीजों का भरोसा

सासाराम सदर अस्पताल रोहतास जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। जिले के विभिन्न प्रखंडों और ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए यहां पहुंचते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सरकारी अस्पताल ही सबसे बड़ा सहारा होते हैं। ऐसे में सदर अस्पताल में उपलब्ध हर सुविधा का प्रभाव सीधे आम लोगों पर पड़ता है। यहां बिजली की निर्बाध आपूर्ति केवल अस्पताल प्रशासन का तकनीकी विषय नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता से जुड़ा सवाल है। जब कोई परिजन गंभीर मरीज को लेकर इमरजेंसी पहुंचता है तो उसे यह भरोसा होना चाहिए कि अस्पताल में बिजली, पानी, ऑक्सीजन, दवा और जरूरी चिकित्सा सुविधाएं हर परिस्थिति में उपलब्ध रहेंगी। इस भरोसे को मजबूत करना किसी भी सरकारी अस्पताल की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।

मोबाइल की रोशनी ने दिखाई व्यवस्था की दरार

सामने आई तस्वीरों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि उन्होंने किसी लंबे दावे या आंकड़े की जरूरत नहीं छोड़ी। एक तस्वीर में डॉक्टर मरीज का इलाज कर रहे हैं और दूसरी ओर मोबाइल की टॉर्च से रोशनी की जा रही है। कभी-कभी तस्वीरें वह सवाल पूछ देती हैं, जिनका जवाब शब्दों में देना कठिन होता है। यहां भी तस्वीर यही पूछ रही है—जिस अस्पताल में मरीज जिंदगी की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहां इमरजेंसी को रोशन रखने की व्यवस्था कितनी मजबूत है? अगर बिजली कटने के कुछ ही क्षणों में वैकल्पिक व्यवस्था पूरी तरह सक्रिय हो जाती, तो शायद मोबाइल की टॉर्च की जरूरत नहीं पड़ती। इसलिए इस घटना को केवल बिजली कटने की समस्या मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। अस्पतालों में जनरेटर और अन्य बैकअप उपकरण स्थापित कर देना ही पर्याप्त नहीं है। उनकी नियमित जांच, ईंधन की उपलब्धता, तकनीकी रखरखाव और जरूरत पड़ने पर तत्काल संचालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। खासकर इमरजेंसी, ऑपरेशन थिएटर, आईसीयू और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों के लिए बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था कितनी देर में सक्रिय होती है, इसकी नियमित समीक्षा होनी चाहिए। साथ ही अस्पताल प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि बिजली आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में मरीजों को किसी प्रकार की असुविधा न हो और चिकित्सा सेवा सामान्य रूप से चलती रहे।

जवाबदेही भी जरूरी, समाधान भी

इस पूरे मामले में अस्पताल प्रबंधन से यह स्पष्ट होना चाहिए कि बिजली क्यों गई, बैकअप व्यवस्था क्यों प्रभावी नहीं रही और इमरजेंसी वार्ड में मोबाइल की रोशनी में इलाज की नौबत क्यों आई। सिर्फ दोष तय करना ही समाधान नहीं है। जरूरी यह है कि घटना की तकनीकी जांच हो, बैकअप सिस्टम की क्षमता और कार्यप्रणाली की समीक्षा की जाए और जो कमी सामने आए उसे तत्काल दूर किया जाए। क्योंकि अस्पताल की व्यवस्था का मूल्यांकन उस समय होता है जब परिस्थितियां सामान्य न हों। सामान्य समय में हर व्यवस्था ठीक दिखाई दे सकती है, लेकिन संकट की घड़ी में ही पता चलता है कि सिस्टम कितना तैयार है। सासाराम सदर अस्पताल से सामने आई मोबाइल की टॉर्च वाली तस्वीरें एक छोटी-सी घटना होकर भी बड़ा सवाल छोड़ जाती हैं। यह सवाल केवल बिजली का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जो आम आदमी सरकारी अस्पताल से करता है। मरीज अस्पताल में यह सोचकर पहुंचता है कि यहां उसकी बीमारी का इलाज होगा, उसकी परेशानी कम होगी और जरूरत पड़ने पर हर जरूरी सुविधा उपलब्ध होगी। इसलिए इमरजेंसी में अंधेरा सिर्फ कमरे का अंधेरा नहीं होना चाहिए। यह व्यवस्था की किसी कमी का संकेत भी नहीं बनना चाहिए। मोबाइल की टॉर्च ने उस वक्त भले ही मरीजों के लिए थोड़ी रोशनी उपलब्ध करा दी, लेकिन इस घटना ने अस्पताल की विद्युत व्यवस्था और आपातकालीन तैयारियों पर जो सवाल खड़े किए हैं, उनका जवाब व्यवस्था को ही देना होगा। क्योंकि इमरजेंसी वार्ड में रोशनी कोई विलासिता नहीं—मरीज की सुरक्षा की पहली जरूरत है। और जब इलाज के लिए मोबाइल की टॉर्च जलानी पड़े, तो उस रोशनी में सिर्फ मरीज का चेहरा नहीं, पूरी व्यवस्था की तस्वीर दिखाई देती है।