Home राजनिति एक महीने बाद भी खाली हाथ दिख रहे हैं नीतीश कुमार

एक महीने बाद भी खाली हाथ दिख रहे हैं नीतीश कुमार

150
0
Even after a month, Nitish Kumar is seen empty handed.

एक महीना बड़ा वक्त होता है राजनीति में, खासकर नीतीश कुमार के लिए। दशकों से नीतीश कुमार को जानने वाले नहीं मान रहे थे कि वह इतनी जल्दी और ऐसे चौंकाने वाले बड़े फैसले ले लेंगे। मुख्यमंत्री की कुर्सी इस तरह छोड़ेंगे। सीएम की कुर्सी छोड़ने के लिए वह राज्यसभा सांसद बनने की इच्छा जताएंगे। अपने बेटे को अपने सामने राजनीति में उतारेंगे। अपने बेटे के मंत्री के रूप में शपथ ग्रहण पर समारोह में बैठेंगे। यह सब अप्रत्याशित था। लेकिन, हुआ। एक महीने पहले, 14 अप्रैल को नीतीश कुमार के बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे से अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाओं की बाढ़ आ गई। इस बाढ़ में किनारे नजर आए स्वयं नीतीश कुमार। तभी तो, जनता दल यूनाईटेड के पुराने लोग यह जानना चाह रहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्यसभा सांसदी के अलावा भी नीतीश कुमार को कुछ देंगे या नहीं?

क्या डील हो रही थी? आज तक पता चला? नहीं। अब तक तो नहीं। क्योंकि बेटे निशांत कुमार को राजनीति में लाना या उन्हें मंत्री बनाना तो नीतीश कुमार के लिए मुख्यमंत्री रहते भी संभव था। इसके लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने की डील जरूरी नहीं थी। वह दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र की सरकार में मंत्री रह चुके हैं। लोकसभा सांसद रहे। विधायक रहे। विधान परिषद् सदस्य रहते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे। ऐसे में उन्होंने जब लिखा कि तीन सदनों का सदस्य रह चुका हूं और चौथे का सदस्य बनने की इच्छा है… तो अजीब लगा। राज्यसभा के लिए नामांकन के बावजूद वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दे रहे थे। कहा जा रहा था कि डील तय नहीं हुई है। जिस तारीख को विधान परिषद् से इस्तीफा देना अंतिम विकल्प रह गया, तब भी इस्तीफा देने खुद नहीं आए। और, विधान परिषद् से इस्तीफे के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं छोड़ रहे थे।

GNSU Admission Open 2026

2023 में बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए ही नीतीश कुमार ने देशभर से भारतीय जनता पार्टी का विरोध करने वाले दलों को एकजुट किया था। तब यह कहा जा रहा था कि वह विपक्षी गठबंधन के सूत्रधार बनेंगे और आगे 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार। वह तो आगे हुआ नहीं। विपक्षी गठबंधन का नाम I.N.D.I.A. रखे जाने से लेकर इसके समन्वय तक में गड़बड़ी का विरोध करते-करते नीतीश ही इससे बाहर निकल आए। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में भाजपा के साथ जनवरी 2024 में वापसी करते हुए नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहे। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी वह कुर्सी से दूर नहीं हुए। राजग की जीत के बाद सीएम बने। 25 से 30 फिर से नीतीश के नारे के साथ। फिर, अचानक छह महीना भी नहीं हुआ कि यह सब हो गया। नीतीश ने जब राज्यसभा जाने का एलान किया, तभी से उनके लिए जनता दल यूनाईटेड ने उप प्रधानमंत्री से कम पद पर समझौता नहीं करने की बात कही। औपचारिक रूप से नहीं, लेकिन बाकी हर तरीके से। 14 अप्रैल को जब उन्होंने सीएम की कुर्सी छोड़ी, तब भी यह मांग कायम थी। 

नीतीश कुमार को शांत समझना मुश्किल है। जब तक शरीर में जान है, वह राजनीतिक रूप से सक्रिय रहेंगे। विधान परिषद् से इस्तीफा देने और मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बीच उन्होंने यात्राओं का सिलसिला जारी रखा। मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बाद भी उनकी सक्रियता में कोई कमी नहीं आई है। जनता दल यूनाईटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते वह अपने बेटे के विभाग के कामकाज की भी समीक्षा कर रहे हैं और जदयू कोटे के दूसरे मंत्रियों से भी उनका हालचाल ले रहे हैं। साये की तरह उनके साथ रहने वाले विजय कुमार चौधरी उप मुख्यमंत्री हैं तो मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के आसपास रहना अब उनकी मजबूरी है। ऐसे में वह जगह जदयू के पुराने और खासकर आर्थिक आधार- ललन सर्राफ ने ले ली है। सीएम सम्राट चौधरी को नीतीश की सक्रियता का एहसास है, इसलिए वह दिल्ली भी जाते हैं तो मिलकर और आते भी हैं तो मिलने पहुंचते हैं। लेकिन, मेलजोल की इन खबरों के बीच जदयू की वह मांग शांत हो गई दिखती है। नीतीश के लिए डिप्टी पीएम का पद मांगने वाले अब सामने नहीं आ रहे हैं, हालांकि अंदर-अंदर इसकी चर्चा लगातार रह रही है कि उन्हें कुछ तो सम्मानजनक मिलना ही चाहिए।