कोलकाता: भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। मशहूर संवैधानिक वकील मेनका गुरुस्वामी राज्यसभा के लिए चुनी गई हैं। वह देश की पहली ऐसी सांसद हैं जिन्होंने खुलकर अपनी पहचान एक क्वीर (एलजीबीटीक्यू+) के रूप में रखी है। पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया था। वह उन 26 नेताओं में शामिल हैं जो निर्विरोध चुनकर उच्च सदन पहुंचे हैं। 51 वर्षीय मेनका गुरुस्वामी का शैक्षणिक रिकॉर्ड भी शानदार रहा है। उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड लॉ स्कूल और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी जैसे दुनिया के बड़े संस्थानों से शिक्षा ली है।
वह लंबे समय से नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक मजबूत आवाज रही हैं। मेनका गुरुस्वामी को साल 2018 की उस बड़ी जीत के लिए जाना जाता है, जिसने भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया। उन्होंने अपनी साथी अरुंधती काटजू के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट में 158 साल पुराने कानून (धारा 377) के खिलाफ लड़ाई लड़ी और उसे रद्द करवाया। यह एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के लिए एक बड़ी जीत थी। गुरुस्वामी ने कहा कि संविधान के समानता, भाईचारा और भेदभाव रहित व्यवहार जैसे मूल्य उनके काम का आधार रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह राज्यसभा में भी पश्चिम बंगाल के लोगों का प्रतिनिधित्व करते हुए इन्हीं आदर्शों को आगे बढ़ाना चाहती हैं। टीएमसी के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने डीडब्ल्यू को बताया कि तृणमूल कांग्रेस ने रणनीति के तहत पढ़े-लिखे और संविधान के जानकारों को संसद भेजने का फैसला किया है।
पार्टी चाहती है कि विपक्ष की दलीलें संसद में मजबूती से रखी जाएं। मेनका के चुने जाने के बाद राज्यसभा में टीएमसी की 13 में से पांच सदस्य अब महिलाएं हैं। उनके साथ ही बाबुल सुप्रियो, पूर्व पुलिस प्रमुख राजीव कुमार और अभिनेत्री कोयल मलिक भी राज्यसभा के लिए चुने गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मेनका के चुनाव का स्वागत किया है। उनका मानना है कि संसद में इस समुदाय का प्रतिनिधित्व होने से भेदभाव के खिलाफ कानून बनाने और समानता लाने में मदद मिलेगी। हालांकि, कुछ जानकारों का कहना है कि यह देखना अहम होगा कि वह इस बड़े और विविध समुदाय की आवाज को कितनी मजबूती से उठाती हैं। दुनिया भर में देखें तो ब्रिटेन की संसद में 75 एलजीबीटीक्यू+ सांसद हैं। वहीं दक्षिण एशिया में नेपाल ने साल 2008 में ही इस समुदाय से अपना पहला सांसद चुन लिया था। भारत में मेनका गुरुस्वामी की यह जीत भविष्य के लिए एक बड़ा रास्ता खोल सकती है।







