
नयी दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में OBC क्रीमी लेयर से जुड़े एक अहम संवैधानिक मुद्दे पर सुनवाई चल रही है, जिसमें यह तय किया जाएगा कि किसी विवाहित OBC महिला की क्रीमी लेयर स्थिति निर्धारित करने के लिए उसके पति की आय को आधार माना जाए या माता-पिता की आय को। इस मामले का फैसला OBC आरक्षण से जुड़े नियमों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
यह मामला कर्नाटक की एक महिला उम्मीदवार से जुड़ा है, जिसने सिविल जज पद के लिए आवेदन किया था। वह OBC की आरक्षित श्रेणी II-A से आती हैं। वर्ष 2018 में उनकी शादी एक ऐसे व्यक्ति से हुई, जो OBC की श्रेणी III-B से संबंधित है। महिला ने चयन प्रक्रिया के दौरान अपने पति की आय के आधार पर क्रीमी लेयर से बाहर माने जाने और संबंधित प्रमाण पत्र जारी करने की मांग की थी।
हालांकि, जिला जाति और आय सत्यापन समिति ने उनकी याचिका खारिज कर दी। समिति का कहना था कि महिला के माता-पिता की आय और पेंशन को ध्यान में रखते हुए वह क्रीमी लेयर के दायरे में आती हैं। महिला की मां न्यायिक सेवा से जिला जज के पद से सेवानिवृत्त हुई थीं और उनके पिता वन विभाग में सहायक संरक्षक के पद से रिटायर हुए थे।
इसके बाद महिला ने इस फैसले को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाई कोर्ट ने भी जिला समिति के फैसले को सही ठहराया और कहा कि माता-पिता की पेंशन को परिवार की आय माना जाएगा।
अब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर अंतिम फैसला होना है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को निर्धारित की है।
इस फैसले से यह स्पष्ट होगा कि OBC वर्ग में विवाहित महिलाओं के लिए क्रीमी लेयर का निर्धारण किस आधार पर किया जाएगा, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय हो सकेंगे।






