
पटना: बिहार भाजपा की अंदरूनी राजनीति इन दिनों दिलचस्प मोड़ पर है। पार्टी के भीतर यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि आखिर संगठन और सरकार में असली “नंबर-2” नेता कौन है—उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी या विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और संगठनात्मक फैसलों ने इस बहस को और तेज कर दिया है।
सम्राट चौधरी को लंबे समय से भाजपा का आक्रामक चेहरा माना जाता रहा है। पिछड़े वर्गों में उनकी पकड़ और तेज़ तेवरों ने उन्हें पार्टी का बड़ा चेहरा बनाया। लेकिन हाल के महीनों में विजय कुमार सिन्हा की सक्रियता और सख्त प्रशासनिक शैली ने समीकरण बदलते दिख रहे हैं। पार्टी और सरकार के कई अहम फैसलों में उनकी भूमिका पहले से कहीं ज्यादा प्रभावशाली नजर आ रही है।
विजय सिन्हा को भाजपा के भीतर एक “हार्ड टास्कमास्टर” के तौर पर देखा जा रहा है। विधानसभा संचालन से लेकर विधायी रणनीति तक, उन्होंने अनुशासन और नियंत्रण का स्पष्ट संदेश दिया है। सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय नेतृत्व भी उनके कामकाज से संतुष्ट है, जिससे उनका कद और मजबूत हुआ है। कई मौकों पर ऐसा देखा गया है कि निर्णायक भूमिकाओं में विजय सिन्हा आगे रहे, जबकि सम्राट चौधरी अपेक्षाकृत बैकफुट पर नजर आए।
पार्टी के अंदरखाने चर्चा है कि संगठन और सरकार के बीच संतुलन साधने में विजय सिन्हा ज्यादा भरोसेमंद साबित हो रहे हैं। वहीं, सम्राट चौधरी की राजनीति अब भी जनआंदोलनों और बयानबाजी पर ज्यादा केंद्रित मानी जा रही है। यही फर्क दोनों नेताओं की ताकत और प्रभाव को अलग-अलग दिशा में ले जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव खुला भले न हो, लेकिन शक्ति संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है। आने वाले समय में कैबिनेट फैसलों, संगठनात्मक नियुक्तियों और चुनावी रणनीति से यह साफ हो जाएगा कि बिहार भाजपा में असली नंबर-2 की कुर्सी पर कौन बैठता है। फिलहाल इतना तय है कि “पावर गेम” में बाजी पलटती दिख रही है और विजय सिन्हा की बढ़ती पकड़ ने सम्राट चौधरी की चुनौती को और कठिन बना दिया है।






