नयी दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा अधिसूचित “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने” वाले नियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने की तैयारी शुरू कर दी है। यह नियम शैक्षणिक परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने और समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए हैं।
मामले की जानकारी सामाजिक कार्यकर्ता और उद्यमी राहुल दीवान की याचिका से सामने आई, जिसे उनके अधिवक्ता पार्थ यादव ने मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत के समक्ष प्रस्तुत किया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नए नियमों के लागू होने से उच्च जाति के छात्रों के साथ भेदभाव हो सकता है और इस विषय पर तत्काल न्यायिक जांच की आवश्यकता है। अदालत ने याचिका की प्रारंभिक समीक्षा के बाद सुनवाई की तारीख तय करने पर विचार करने की सहमति जताई और याचिकाकर्ताओं को याचिका में पाई गई खामियों को दूर करने का निर्देश दिया।
दीवान की याचिका 2026 के नियमों के खिलाफ दायर की गई कम से कम तीन याचिकाओं में से एक है। अन्य याचिकाएं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पोस्ट-डॉक्टरल शोधकर्ता मृत्युंजय तिवारी और अधिवक्ता विनीत जिंदल द्वारा दायर की गई हैं। यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को इन नियमों को अधिसूचित किया था, जो 2012 के पुराने ढांचे को प्रतिस्थापित करते हैं।
नए नियमों के तहत विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और मान्यता प्राप्त संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों का निवारण करने के लिए समान अवसर केंद्र और समानता समितियां अनिवार्य रूप से स्थापित करनी होंगी। इस कदम को 2019 में उच्च शिक्षा में भेदभाव-विरोधी सुरक्षा उपायों को मजबूत करने वाली सर्वोच्च न्यायालय की याचिका के परिणाम स्वरूप तैयार किया गया।
हालांकि हाशिए पर रहने वाले छात्र समूहों ने इस ढांचे का स्वागत किया है, कुछ उच्च जाति के छात्र और संगठन इसे अस्पष्ट और संभावित दुरुपयोग का कारण मान रहे हैं। मंगलवार को दिल्ली स्थित यूजीसी मुख्यालय के बाहर कुछ छात्रों ने नियमों को वापस लेने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन भी किया। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक समीक्षा के लिए सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया में है।







