
पटना: बिहार चुनाव में कट्टा शब्द बड़े जोर से उछला था। पीएम मोदी तक के भाषणों में कट्टा खूब गूंजा। लेकिन अब बिहार में कट्टे से ज्यादा कट्ठे की गर्मी है। वैसे भी बिहार में जब कोई मकान बनाने की तैयारी करता है, तो मजदूरी की बात कहने पर राज मिस्त्री एक कहावत कहता है। कहावत ये कि वो आदमी देख कर समझ जाता है कि मकान बनाने की गर्मी कट्टे की है या कट्ठे की। कट्टा माने रंगदारी की कमाई कट्ठा माने खेत या जमीन बेच कर आए पैसे। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि बिहार में जमीन के रेट किस कदर आसमान छू रहे हैं। जगह कम पड़ रही है और हर किसी को अपने घर की तलाश है। ऐसे में लोगों की जमीनों पर बिल्डरों की नजर है। ताकि 4 कट्ठे जमीन ली जाए और उस पर 20 फ्लैट खड़े कर दिए जाएं। इस तरह के मोल भाव में जो सबसे बड़ा गोलमाल होता है, वो होता है जमीन की रजिस्ट्री में खेल का। एक उदाहरण से समझिए कि सर्किल रेट यानी सरकारी रेट होता है 40 हजार रुपये कट्ठा। जमीन की खरीद भी रजिस्ट्री में यही रेट बताकर होती है।
लेकिन असल कीमत लगाई जाती है 20 लाख रुपये कट्ठे तक की। ऐसे में बिल्डर और दलाल जमीन मालिकों को मोटी रकम देते हैं, खुद भी मोटा कमाते हैं और नुकसान होता है सरकार के रेवेन्यू का। अब बिहार सरकार इसका तोड़ निकालने की तैयारी में है। बिहार में जमीन के सर्किल रेट को मौजूदा दर से बढ़ाकर बाजार मूल्य के करीब लाने की कवायद तेज हो गई है। प्रस्ताव के तहत कई इलाकों में सर्किल रेट में 400 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की जा सकती है। इस संबंध में अंतिम निर्णय राज्य सरकार को लेना है और जल्द ही प्रस्ताव कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा। जिन क्षेत्रों में सर्किल रेट और बाजार भाव में ज्यादा अंतर नहीं है, वहां मौजूदा दरों में अधिकतम 50 प्रतिशत तक की वृद्धि प्रस्तावित है। राजधानी पटना के पश्चिमी और पूर्वी बोरिंग कैनाल रोड पर फिलहाल जमीन का सर्किल रेट 30 लाख रुपये प्रति डिसिमल तय है। निबंधन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, जमीन की रजिस्ट्री में प्रति कट्ठा कीमत लगभग एक करोड़ रुपये दिखाई जाती है, जबकि वास्तविक सौदे छह से सात करोड़ रुपये में होते हैं। यह स्थिति केवल पटना तक सीमित नहीं है।
बांका जिले में जहां सर्किल रेट करीब 12 हजार रुपये प्रति कट्ठा है, वहां जमीन की खरीद-बिक्री छह से सात लाख रुपये में हो रही है। जानकारी के मुताबिक, पटना जिले का नौबतपुर प्रखंड पूरे राज्य में जमीन कारोबार का हॉटस्पॉट बन चुका है। यहां सर्किल रेट करीब 22 हजार रुपये प्रति कट्ठा है, जबकि वास्तविक सौदे 20 से 25 लाख रुपये में हो रहे हैं। सर्किल रेट वह न्यूनतम सरकारी दर होती है, जिस पर जमीन या मकान की रजिस्ट्री होती है और इसी आधार पर स्टांप ड्यूटी व निबंधन शुल्क तय किया जाता है। अधिकतर मामलों में वास्तविक सौदे नकद में ऊंची कीमत पर होते हैं, जबकि कागजों में कम सर्किल रेट दर्शाया जाता है। इसी वजह से सर्किल रेट बढ़ाने की जरूरत बताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सर्किल रेट में वृद्धि नहीं होने से सरकार को राजस्व का नुकसान, काले धन को बढ़ावा और बिल्डर-दलाल गठजोड़ मजबूत होने जैसी समस्याएं सामने आती हैं। मद्य निषेध एवं निबंधन विभाग के सूत्रों के अनुसार, यदि सरकार प्रस्तावित दरों को मंजूरी नहीं देती है तो एक वैकल्पिक योजना भी तैयार है। इसके तहत कम से कम दो गुना सर्किल रेट बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा, जिससे सालाना करीब एक हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त राजस्व मिलने का अनुमान है। फिलहाल पुराने सर्किल रेट के आधार पर सरकार को लगभग 7600 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हो रहा है।






