
गयाजी : धर्म और आध्यात्म से जुड़ीं पौराणिक मान्यताएं आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारती हैं, जबकि विज्ञान साफ तौर पर आत्मा को मान्यता नहीं देता। लेकिन समय-समय पर कई ऐसी घटनाएं होती हैं जो आत्मा या भूत-प्रेत के अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर देती हैं। प्रेतों को लेकर कई रहस्य हैं। बिहार के गयाजी में प्रेत आत्माओं के अस्तित्व को न सिर्फ मजबूती के साथ स्वीकारा जाता है बल्कि उन्हें संतुष्ट करने के लिए जटिल कर्मकांड भी किए जाते हैं। गयाजी में प्रेतों की अलग दुनिया है और उनके किस्से बहुत सारे रहस्य समेटे हैं। कहा जाता है कि श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों की आत्माएं खुद धरती पर आती हैं और अपने परिवार के लोगों को किसी ने किसी माध्यम से अपने होने का अहसास कराती हैं। गया में रहस्य और रोमांच से भरपूर एक जगह है।
यह स्थान अपने आप में विचित्र है। कहा जाता है कि श्राद्ध पक्ष में यहां पितरों का आगमन होता है और पिंड ग्रहण करके वे परलोक वापस चले जाते हैं। गया के पास स्थित इस जगह का नाम प्रेतशिला है। प्रेतशिला 876 फीट ऊंचा एक पर्वत है, जिसकी तलहटी में कुछ गांव भी बसे हैं। प्रेतशिला के बारे में कहा जाता है कि यहां अकाल मृत्यु को प्राप्त पूर्वजों के श्राद्ध और पिंडदान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस पर्वत पर पिंडदान करने से पूर्वज सीधे पिंड ग्रहण कर लेते हैं। ऐसा होने के बाद उन्हें कष्टदायी योनियों में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती। किसी की अकाल मृत्यु होने पर प्रेतशिला में आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए श्राद्ध किया जाता है। यहां 776 सीढ़ी चढ़कर प्रेतशिला पर्वत पर जाना होता है। वहां पर कर्मकांड होता है। प्रेतशिला के पास एक वेदी है जिस पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न बने हैं।
इसके पीछे कथा है कि यहां गयासुर की पीठ पर बड़ी सी शिला रखकर भगवान विष्णु स्वयं खड़े हुए थे। प्रेतशिला के पास के पत्थरों में विशेष प्रकार की दरारें और छिद्र हैं। इनके बारे में कहा जाता है कि इन पत्थरों के उस पार रहस्य और रोमांच की ऐसी दुनिया है जो लोक और परलोक के बीच एक कड़ी का काम करती है। इन दरारों के बारे में कहा जाता है कि इनसे होकर प्रेतात्माएं आतीं और अपने परिजनों द्वारा किए गए पिंडदान को ग्रहण करके वापस चली जाती हैं। कहते हैं कि जब लोग पिंडदान करने यहां पहुंचते हैं तो उनके साथ उनके पूर्वजों की आत्माएं भी यहां चली आती हैं। सूर्यास्त के बाद ये आत्माएं विशेष प्रकार की ध्वनि, छाया या फिर किसी और प्रकार से अपने होने का अहसास कराती हैं। ये बातें यहां आस्था और विज्ञान से जुड़ी बातों पर आधारित हैं। इन्हें न तो झुठलाया जा सकता है और न ही इन्हें सर्वसत्य माना जा सकता है।






