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गोदना-सेमरिया मेला बना आस्था का केंद्र, जहां अहिल्या उद्धार स्थल पर गंगा स्नान से मिलता है मोक्ष

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The Godna-Semaria fair has become a center of faith, where salvation is attained by bathing in the Ganga at the Ahalya Uddhar Sthal.

सारण: बिहार के सारण जिले की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और गौरवशाली धरती रिविलगंज इन दिनों धार्मिक उत्साह और भक्ति भावना से सराबोर है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम चंद्र की लीला भूमि, न्याय शास्त्र के प्रणेता महर्षि गौतम और श्रृंगी ऋषि की तपोस्थली गौतम स्थान पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। मंगलवार की देर शाम से ही सरयू नदी के पावन तट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटने लगी और बुधवार की सुबह से देशभर से आए हजारों भक्त सरयू में आस्था की डुबकी लगाकर पुण्य अर्जित करने में जुट गए। महर्षि गौतम-अहिल्या उद्धार मंदिर, गोदना, अकराहा बाबा मठ, करियावा बाबा मंदिर, जहाज घाट, श्रीनाथ बाबा मंदिर घाट सहित रिविलगंज के दर्जनों मंदिरों और मठों में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। प्रशासन ने मेले में आए श्रद्धालुओं के लिए रात्रि विश्राम और अन्य सुविधाओं की विशेष व्यवस्था की है। पूरा क्षेत्र भक्ति, आस्था और पौराणिक परंपरा के रंग में रंगा हुआ है। स्थानीय लोग “अतिथि देवो भव” की भावना के साथ दूर-दराज से आए भक्तों का स्वागत कर रहे हैं।

गौतम ऋषि की तपोभूमि सरयू तट धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, त्रेता युग में यहीं महर्षि श्रृंगी के पुत्र्येष्ठि यज्ञ के फलस्वरूप भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। यही कारण है कि यह भूमि न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखती है। चार किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में मंदिरों की प्राचीन श्रृंखला इसकी ऐतिहासिकता को दर्शाती है। बाल्मीकि रामायण में भी इस स्थल का विस्तृत उल्लेख मिलता है। यहां का गोदना-सेमरिया नहान मेला धार्मिक दृष्टि से सोनपुर के हरिहर क्षेत्र मेला और बलिया के ददरी मेले जितना ही महत्वपूर्ण है। भले ही व्यावसायिक प्रसिद्धि सोनपुर या ददरी को मिली हो, लेकिन आस्था और पौराणिकता में रिविलगंज का मेला किसी से कम नहीं है। शास्त्रों के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन सरयू नदी में स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। तुलसीदास जी ने भी रामचरित मानस में सरयू स्नान की महिमा का उल्लेख करते हुए लिखा है,  “कोटि कल्प काशी बसे, मथुरा बसे हजार, एक निमित्त सरयू बसे, तुलसी न तुलसी दास।” कहा जाता है कि इस दिन सरयू में स्नान करने वाला भक्त वैकुंठ लोक को प्राप्त करता है। यही कारण है कि हर साल बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल से लाखों श्रद्धालु इस अवसर पर रिविलगंज पहुंचते हैं।

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गौतम स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां झूठ बोलने की मनाही है। मान्यता है कि महर्षि गौतम ने यहीं सत्य और असत्य का निर्णय किया था। जो भी व्यक्ति यहां झूठ बोलता है, उसे तत्काल दंड मिलता है। यही वह स्थान है जहां महर्षि गौतम ने अपनी पत्नी अहिल्या को श्राप दिया था और भगवान श्रीराम के चरण स्पर्श से उनका उद्धार हुआ था। गोदना स्थित गौतम-अहिल्या उद्धार मंदिर में भगवान श्रीराम के चरण चिन्ह आज भी मौजूद हैं। मान्यता है कि बक्सर में राक्षसी ताड़का का वध करने के बाद श्रीराम, लक्ष्मण और वशिष्ठ मुनि गंगा पार कर रिविलगंज पहुंचे थे और कार्तिक पूर्णिमा के दिन सरयू में स्नान के बाद यहीं विश्राम किया था। स्नान के बाद सतू और मूली खाने की परंपरा आज भी प्रतीक रूप में निभाई जाती है। इतिहासकारों और स्थानीय लोगों का मानना है कि यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की विरासत है। इतिहासकार उदय नारायण सिंह ने बताया कि वर्षों से यह मांग की जा रही है कि इस मेले को रामायण सर्किट से जोड़ा जाए और इसे राष्ट्रीय स्तर के पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए। लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और जनप्रतिनिधियों की इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह मेला अभी भी सीमित दायरे में सिमट गया है। स्थानीय नागरिकों और प्रशासन से अपेक्षा है कि इस तपोभूमि के संरक्षण और विकास के लिए ठोस कदम उठाए जाएं ताकि आने वाली पीढ़ियां भी भगवान श्रीराम, गौतम ऋषि और श्रृंगी ऋषि की इस पावन धरती की महिमा से परिचित हो सकें।






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