पटनाः बिहार में इस बार का विधानसभा चुनाव कई मायनों में खास है। ये संभवतः मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का आखिरी चुनाव हो सकता है, जिन्होंने सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया है। नीतीश कुमार भारतीय राजनीति में एक ऐसे बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं जहां मुख्यमंत्री वही रहे, लेकिन उनके साथ गठबंधन करने वाले दल बदलते रहे। उनकी खासियत यह है कि न तो भाजपा के साथ रहने पर उन पर सांप्रदायिकता का आरोप लगता है और न ही आरजेडी के साथ होने पर भ्रष्टाचार का। दोनों ही दल उन्हें अपने साथ रखने को तैयार रहते हैं। इस बार एनडीए में जेडीयू और भाजपा बराबर सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि महागठबंधन में तालमेल का अभाव लंबे समय तक बना रहा। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी विकास को विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या वह चुनाव के बाद एक बड़े खिलाड़ी के रूप में उभरेंगे।
बिहार की राजनीति पिछले 35 सालों से लालू और नीतीश के इर्द-गिर्द घूम रही है, लेकिन विकास के मुद्दे पर बिहार अभी भी पीछे है। साल 2000 में नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब वह समता पार्टी के नेता थे। उनकी पार्टी को 37 सीटें मिली थीं, जबकि भाजपा के 67 विधायक थे। फिर भी, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के फैसले से उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि, यह सरकार सिर्फ सात दिनों तक ही चली, लेकिन इस घटना ने नीतीश कुमार को बिहार में एनडीए का नेता बना दिया। अब, 20 साल बाद, एनडीए में जेडीयू और भाजपा बराबर सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। दूसरी ओर, महागठबंधन में तालमेल की कमी लंबे समय तक बनी रही। काफी जद्दोजहद के बाद, कांग्रेस ने आखिरकार आरजेडी नेता तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने पर सहमति जताई।
मुकेश सहनी को गठबंधन ने उपमुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया है। मुख्य मुकाबला एनडीए और महागठबंधन के बीच है, लेकिन प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी इसे त्रिकोणीय बनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, यह कहना मुश्किल है कि प्रशांत किशोर चुनाव के बाद एक बड़े खिलाड़ी के रूप में उभरेंगे या नहीं। फिर भी, उन्होंने जाति की जगह विकास को चर्चा का मुख्य विषय बनाने का प्रयास जरूर किया है। प्रशांत किशोर ने टिकट साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को दिए हैं। लेकिन राघोपुर से तेजस्वी यादव के खिलाफ चुनाव लड़ने की घोषणा करने के बाद पीछे हटने से उनकी छवि पर सवाल उठे हैं। यह भी सवाल उठता है कि जब वह पैसे लेकर BJP, JDU और अन्य दलों के लिए रणनीति बना रहे थे, तो अचानक उन्हें हर पार्टी भ्रष्ट क्यों नजर आने लगी?







