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गया के दशरथ मांझी का गांव: सड़क तो पहुंची, लेकिन विकास अब भी पहाड़ जैसा मुश्किल

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Dashrath Manjhi's village in Gaya: The road has arrived, but development remains a mountainous challenge

गेहलौर: गयाजी से गेहलौर का रास्ता अब हर कोई बता देता है। टूरिस्ट प्लेस की लिस्ट में भी गेहलौर घाटी शामिल है। क्योंकि अब यहां माउंटेनमैन का स्मारक है और वह सड़क जिसे दशरथ मांझी ने पहाड़ का सीना चीरकर बनाई। इस पर मूवी भी बन गई है तो यहां आने का आकर्षण भी टूरिस्टों में बढ़ा है। दशरथ मांझी द्वार पर ही टूरिस्टों से भरी एक बस आकर रूकी। पूछने पर बताया पटना से आए हैं। इसमें अलग-अलग शहरों के लोग हैं, जो पटना में नौकरी करते हैं। दशरथ मांझी द्वार से ऊपर की तरफ जाने पर है वह सड़क, जिसने गेहलौर को पहचान दिलाई। पहाड़ के बीच से जाती सड़क। आसपास कुछ दुकानें भी हैं।

लोगों ने बताया कि पहले ये सब नहीं था। गेहलौर पंचायत के प्रमुख ठाकुर राणा रंजीत ने कहा कि दशरथ मांझी की वजह से यहां स्थिति सुधरी है। पहले कई घंटों के इंतजार के बाद एक डाक गाड़ी आती थी और उसी में लदकर सब जाते थे। सड़क आने से सरकार का ध्यान भी इधर गया और फिर पर्यटकों के आने से यहां चहलपहल भी होने लगी। वे कहते हैं कि दो चीज की यहां सबसे ज्यादा दिक्कत है। रोजगार और सिंचाई की। वह बताते हैं कि पलायन की वजह से यहां घरों में पुरुष काफी कम बचे हैं। पलायन मजबूरी बन गया है, क्योंकि रोजगार का कोई साधन नहीं है। सिंचाई का भी कोई परमानेंट साधन नहीं है और पूरी तरह मौसम पर ही निर्भर रहना होता है। इसलिए मजदूरों को भी यहां काम नहीं मिल पाता। ईंटा-भट्टी में काम करने लोग दूसरे राज्यों में जा रहे हैं और वहां भी काम की स्थिति ऐसी कि कई मजदूरो की डेडबॉडी ही गांव वापस आई। पास ही हैंडपंप में पानी भरने आई शारदा देवी से ये पूछने पर कि गेहलौर के फेमस होने का कितना फायदा हुआ, ये सवाल सुनकर वह बिफर जाती हैं। कहती हैं कि क्या फेमस…पानी की दिक्कत तक तो दूर होती नहीं। हमारे घर देखो छप्पर के घर हैं, बारिश होने पर सब पानी अंदर आ जाता है।

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फिर कहती हैं कि नेता लोग वोट मांगने तो आ जाते हैं पर गरीब की सुनता कौन है। उनके साथ ही और महिलाएं भी हैं जो पानी भरने और कपड़े धोने के लिए दूर से यहां पर आई हैं। सबने अपनी नाराजगी भी जताई। सरकार की तरफ से राशन मिलता है, इसका जवाब सबने हां में दिया। लेकिन बताया कि सरकार तो एक आदमी को पांच किलो राशन देती है, लेकिन यहां हमें चार किलो ही मिलता है। गेहलौर अतरी विधानसभा क्षेत्र में आता है। ये गया जिले की ही एक विधानसभा हैं। इसी गांव से थोड़ा दूर दूसरा गांव है करजनी। यहां रामजी मांझी से चुनाव के बारे में पूछने पर उन्होंने तुरंत कहा, यहां तो मोदी जी हैं। लेकिन जब स्थानीय विधायक का नाम और पार्टी के बारे में पूछा तो उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी। रामजी मांझी की मां राजकुमारी देवी शिकायत करती हैं कि जीतन राम मांझी गेहलौर आते हैं, लेकिन यहां नहीं आते। बच्चे पास ही मिट्टी में खेल रहे हैं। स्कूल नहीं जाते, पूछने पर दूर इशारा करते हुए तरनी देवी ने कहा कि इतना दूर बच्चों को कैसे भेजें, बीच में यहां सब पानी भर जाता है, कैसे बच्चा लोग उतनी दूर जाएगा।

वृद्धावस्था पेंशन यहां बुजुर्गों को मिल रही है, लेकिन महिलाओं ने कहा कि वोट मांगने जब लोग आते हैं तो मर्दों को तो पैसे दे देते हैं, हमें कोई कुछ नहीं देता। दशरथ मांझी ने जब 1960 में छेनी और हथौड़ी से पहाड़ तोड़ना शुरू किया और कहा कि पहाड़ काटकर रास्ता बनाऊंगा तो सबने उन्हें पागल कहा, लेकिन 1960 से 1982 तक उन्होंने जुनूनी की तरह इस काम को किया और 22 साल में पहाड़ काटकर 360 फुट लंबा, 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा रास्ता तैयार कर लिया। दशरथ मांझी की पत्नी फाल्गुनी देवी पहाड़ से गिरकर चोटिल हो गई थी और इलाज न मिल पाने की वजह से 1959 में मौत हो गई थी। पहाड़ के पीछे अस्पताल था, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए बहुत लंबा रास्ता था। पत्नी की मौत के बाद दशरथ मांझी ने उस पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बनाने की ठानी और असंभव को संभव कर दिखाया। 2007 में 73 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। दशरथ मांझी पर 2015 में एक मूवी भी बनी- मांझी- द माउंटेन मैन। अब दशरथ मांझी के परिवार के लोग विधानसभा चुनाव में टिकट की उम्मीद कर रहे हैं।

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