सुपौल: सुपौल में आरटीआई कार्यकर्ता और जन सुराज नेता अनिल कुमार सिंह ने सोमवार को जिला जन सुराज कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सुपौल विधायक और बिहार के मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव पर कई गंभीर आरोप लगाए। अनिल कुमार सिंह ने कहा कि मंत्री को उनके समर्थक कोसी का विश्वकर्मा और विकास पुत्र बताते हैं, लेकिन वह विकास के पिता हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अपने 35 साल के राजनीतिक करियर में मंत्री ने परिवार और रिश्तेदारों को करोड़पति बनाया और आम जनता को गरीब। उन्होंने मंत्री की डिग्री को भी संदेह के दायरे में बताया। वर्ष 2005 से 2015 तक चुनावी हलफनामे में उन्होंने खुद को विज्ञान विषय से स्नातक पास बताया, लेकिन 2020 में उच्चतम डिग्री इंटरमीडिएट दिखायी।
अनिल ने आरोप लगाया कि मंत्री ने सुपौल की जनता, कानून और सरकार को धोखा दिया है। उन्होंने कहा कि मंत्री न्यायालय से फरारी रहे हैं। पटना कोर्ट में उनके खिलाफ 1992 में बिजली विभाग के एक अभियंता मामले में मुकदमा दर्ज हुआ और वारंट तथा कुर्की का आदेश भी जारी हुआ। मंत्री 8 मार्च 2000 से फरार रहे। बाद में वर्ष 2006 में उन्होंने फरियादी ललन प्रसाद सिंह को सरकारी पद देकर समझौता कर लिया। वर्ष 2000 से 2006 तक मंत्री होकर कोर्ट की नजर में फरारी रहे, बावजूद इसके 2005 के एफिडेविट में उन्होंने मामले का जिक्र नहीं किया। अनिल ने यह भी आरोप लगाया कि मंत्री ने अन्य जिला परिषद सदस्यों को गिरफ्तार कर अपनी बहन कमला देवी को जिला परिषद का अध्यक्ष बनवाया।
मंत्री का भांजा अब जिला परिषद की अधिकांश ठेकेदारी करता है। अनिल कुमार सिंह ने आरोप लगाया कि सुपौल में राष्ट्रीय सार्वजनिक मेला की कुल 13 बीघा 9 कट्ठा जमीन यानी 64 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति पर मंत्री ने अपने चहेते भ्रष्ट अधिकारियों के माध्यम से कब्जा कर लिया। उन्होंने बताया कि फर्जी तरीके से राष्ट्रीय सार्वजनिक मेला समिति बनाई गई और इसके नाम पर करोड़ों का घोटाला किया गया, जिसकी जांच होनी चाहिए। अनिल ने कहा कि मंत्री पर बिजली विभाग में भी करोड़ों के घोटाले का आरोप है। तत्कालीन प्रधान सचिव संजय हंस को गिरफ्तार किया गया और वह जेल में हैं, जो पहले सुपौल में डीएम भी रह चुके हैं। मामले में मंत्री की भूमिका भी संदिग्ध है। अनिल ने बताया कि ये सभी मंत्री बनने से पहले कुछ नहीं थे, लेकिन अब करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं। उन्होंने कहा कि मंत्री के पीए विनोद भगत की नियुक्ति भी अवैध है। विधानसभा से रिटायर होने के बाद वह प्राइवेट पीए बने, जबकि इससे पहले सरकारी पीए थे। मंत्री और उनके पीए का सभी ठेकेदारी में शेयर बनता है।







