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जब जीते भी राम, हारे भी राम—हाजीपुर की वो फाइट जब ‘जाइंट किलर’ बनकर उभरे थे दास

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When Ram won, Ram lost—the Hajipur battle when Das emerged as a 'giant killer'

बिहार के 15वें सीएम रहे राम सुंदर दास को बिहार के उन जाइंट किलर पॉलिटिशियन के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने दलित कम्युनिटी के सबसे लोकप्रिय नेता राम विलास पासवान को नाकों चने चबवा दिए थे। राम सुंदर दास (9 जनवरी 1921 से 6 मार्च 2015) जनता पार्टी के मुखर नेता थे। बाद में वह जदयू के साथ आ गए। वह 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980 तक 302 दिनों के लिए बिहार के सीएम रहे। उनकी क्लीयर इमेज ही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी। साल 2009 के लोकसभा चुनाव में राम सुंदर दास ने हाजीपुर सीट से जीत दर्ज की थी। उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष और दलितों के कद्दावर नेता राम विलास पासवान को करीब 38 हजार वोट से हराकर उस साल को यादगार बना दिया था। वरिष्ठ पत्रकार अशोक शर्मा के मुताबिक हाजीपुर सीट पर राम विलास पासवान को हराना कोई साधारण बात नहीं थी, वह भी 88 साल के उम्रदराज राम सुंदर दास के लिए।

राम विलास पासवान ने पहली बार 1977 में हाजीपुर सीट से चुनाव जीता और अंतर इतना विशाल था कि वह गिनीज बुक में दर्ज हुआ था। राम विलास पासवान ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 4.24 लाख वोट से हराया था, जो संसदीय चुनाव में सबसे बड़ा अंतर था। शर्मा के मुताबिक राम विलास पासवान को हाजीपुर सीट पर हराना नामुमकिन था। लेकिन 2009 में राम सुंदर दास ने ऐसी पटखनी दी कि लोजपा अध्यक्ष को एकबार लगा कि उनकी सियासत खत्म होने वाली है जबकि वह केंद्र में मंत्री पद संभाल रहे थे। इससे पहले 1984 में पासवान को हार का मुंह देखना पड़ा था। चुनाव आयोग के मुताबिक 2009 के चुनाव में राम सुंदर दास को 2.46 लाख वोट मिले थे जबकि पासवान को 2.08 लाख। इस जीत पर जदयू के एक कार्यकर्ता ने कहा था- यह तो होना ही था। हमें पता था कि हमारे राम सुंदर बाबू जरूर जीतेंगे। इस पर दास की प्रतिक्रिया थी कि उनकी जीत हाजीपुर की जनता की जीत है।

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यह नीतीश कुमार की नीतियों की जीत है। इस हार के बाद राम विलास पासवान को राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की मदद लेनी पड़ी थी। शर्मा बताते हैं कि लालू ने उनको राज्यसभा सांसद बनाकर वापस केंद्र की सियासत में एक्टिव किया था। हालांकि 2014 का लोकसभा चुनाव फिर उनके लिए मुश्किल घड़ी लेकर आया। एक बार फिर राम सुंदर दास ने उन्हें इस सीट पर चुनौती दी। 2014 के लोकसभा चुनाव में राम सुंदर दास देश के सबसे उम्रदराज उम्मीदवारों में से एक थे। 93 साल की उम्र में जब वे हाजीपुर से चुनाव लड़ रहे थे, तब उनकी शारीरिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि उन्हें दो लोग मंच तक उठाकर ले गए थे, फिर भी उनका जज्बा कम नहीं हुआ था। हालांकि इस बार फतह नहीं मिली। राम सुंदर दास बिहार के मुख्यमंत्री और 2 बार सांसद रहने के बावजूद पटना में एक साधारण से दो मंजिला मकान में रहते थे। उनके पास संपत्ति के नाम पर बहुत कम पूंजी और एक पुरानी एम्बेसडर कार थी। बाद में 6 मार्च 2015 को उनका निधन हो गया।

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