कटिहार: कदवा विधानसभा में गत दो चुनाव से बागी एनडीए का खेल बिगड़ रहा है। वहीं, गठबंधन के सहारे कांग्रेस 30 वर्षों का सूखा समाप्त कर लगातार दो बार से जीत का परचम लहरा रही है। आगामी विधानसभा में एनडीए में रहेगा मेल या फिर बिगड़ेगा खेल यह वक्त बताएगा। बता दें कि कदवा विधानसभा चुनाव में प्रत्येक बार मतदाताओं का मूड मियाज अलग अलग देखने को मिला है। 1980 के विधानसभा चुनाव से आकलन करें तो उस वक्त निर्दलीय मांगन इंसान ने कांग्रेस प्रत्याशी को पटखनी देकर निर्वाचित हुए थे। पुनः 1985 में कांग्रेस के प्रोफेसर उस्मान गनी निर्वाचित हुए।
उसके बाद कांग्रेस जीत के लिए तरसती रही। वहीं, 1990 के दशक में राष्ट्रीय जनता दल की लहर के वाबजूद भी आरजेडी के लिए अनुकूल कदवा सीट पर कभी सफलता नहीं मिली। 1990 में जहां कदवा के मतदाताओं ने पुनः निर्दलीय अब्दुल जलील को सिर पर बिठाया तो 1995 में पहली बार भोला राय चुनाव जीत कर भाजपा का कमल खिलाया था। 2000 में फिर से कदवा की मतदाताओं ने पलटी मारते हुए निर्दलीय हिमराज सिंह को जिताया जो राजद के राबड़ी सरकार में पथ निर्माण राज्य मंत्री बने। वहीं, 2005 में दोनों चुनाव में एनसीपी के टिकट पर अब्दुल जलील ने बाजी मार ली। 2010 में पुनः भाजपा से भोला राय चुनाव जीते। 2015 में महागठबंधन के तहत कांग्रेस के खाते में सीट गई।
उस वक्त जदयू, राजद, कांग्रेस सहित अन्य दल एक थी। उक्त चुनाव में भाजपा की ओर से चंद्रभूषण ठाकुर मैदान में थे, लेकिन टिकट नहीं मिलने की वजह से भाजपा के ही एक वरिष्ठ कार्यकर्ता के बागी मैदान में उतारने की वजह से भाजपा पांच हजार से अधिक वोट से हार गई। जिस वजह से कांग्रेस का 30 वर्षों का सूखा खत्म कर शकील अहमद खान निर्वाचित हुए। पुनः 2020 के चुनाव में सीट जदयू के खाते में चली गई। जदयू से सूरज प्रकाश राय को टिकट मिली। जदयू को सीट जाने से भाजपाइयों में गहरा आक्रोश देखा गया। पिछली चुनाव में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े चंद्रभूषण ठाकुर बागी होकर लोजपा के टिकट पर चुनावी मैदान में उतर कर एनडीए का खेल बिगड़ दिया।
जिसका लाभ कांग्रेस को मिला और लगातार दूसरी बार शकील कांग्रेस के विधायक बने। एनडीए से चुनाव लड़े जदयू तीसरे नंबर पर रही। आगामी विधानसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन क्षेत्र में एनडीए की सीट को लेकर दिनों दिन दावेदारों की संख्या बढ़ती जा रही है। भाजपा एक बार फिर सीट मिलने की उम्मीद में है। उम्मीदवारों की घोषणा के बाद ही यहां के समीकरणों का अनुमान लगाया जा सकता है। आगामी चुनाव में एनडीए का कुनबा एकजुट रह पाता है या फिर पिछली गलतियों की पुनरावृत्ति होती है, यह वक्त बताएगा।







