
भागलपुर: भागलपुर जिले के कहलगांव में पर्यटन विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। जिला प्रशासन को पर्यटन निदेशालय द्वारा कहलगांव स्थित ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक स्थलों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया गया है। इनमें गंगा नदी के बीच स्थित तीन पहाड़ियां और बंगाल के अंतिम स्वतंत्र शासक महमूद शाह का मकबरा प्रमुख हैं। गंगा नदी की मुख्य धारा के बीच स्थित तीन पहाड़ियां पंजाबी बाबा, शांति बाबा और बंगाली बाबा की पहाड़ी अपने शांत, सुरम्य वातावरण और आध्यात्मिक महत्ता के लिए जानी जाती हैं। ये पहाड़ियां न केवल स्थानीय निवासियों के लिए आस्था का केंद्र हैं, बल्कि दूर-दराज से आने वाले पर्यटकों को भी आकर्षित करती हैं।
यह क्षेत्र विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य का हिस्सा है, जिससे पर्यटकों को दुर्लभ गंगा डॉल्फिन को देखने का भी अवसर मिलता है। नौका विहार, पहाड़ी भ्रमण और गंगा दर्शन इस स्थल को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करते हैं। हालांकि वर्तमान में इन पहाड़ियों पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, लेकिन पर्यटन निदेशालय ने रोपवे निर्माण, घाटों के सौंदर्यीकरण और व्हाइट वाटर राफ्टिंग जैसे विकल्पों पर विचार करने को कहा है। यह पहल न केवल पर्यटन को बढ़ावा देगी, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी प्रदान करेगी। कहलगांव स्थित महमूद शाह का मकबरा ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मकबरा बंगाल के अंतिम स्वतंत्र शासक महमूद शाह का है, जिनकी मृत्यु शेरशाह सूरी से युद्ध में पराजय के बाद यहीं हुई थी। यह स्मारक पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है और कई ऐतिहासिक तथ्यों को समेटे हुए है।
पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होने पर इसके संरक्षण को बल मिलेगा और इतिहास में रुचि रखने वाले पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकेगा। जिला प्रशासन को इन दोनों स्थलों की ऐतिहासिक, धार्मिक, पर्यावरणीय और पर्यटक संभावनाओं को चिन्हित करते हुए विस्तृत प्रस्ताव तैयार करने को कहा गया है। कहलगांव के अंचलाधिकारी को स्थल का नक्शा और आवश्यक जानकारी शीघ्र उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है। वरीय उपसमाहर्ता मिथिलेश कुमार सिंह ने बताया कि इन स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव दिया गया है। कहलगांव के सीओ को दोनों स्थलों का नजरी नक्शा और विस्तृत विवरण उपलब्ध कराने को कहा गया है। इन स्थलों के पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित होने से न केवल कहलगांव को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी। साथ ही, इससे क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे और सांस्कृतिक-ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सकेगा।






