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दरभंगा की अंतिम महारानी का अमिट योगदान, संविधान से राष्ट्र रक्षा तक देश को दिए अनमोल तोहफे

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The last queen of Darbhanga made indelible contributions, giving precious gifts to the nation, from the Constitution to national defense.

दरभंगा: राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ भले ही एक युग का अंत हो गया हो, लेकिन महाराज कामेश्वर सिंह और महारानी द्वारा दरभंगा, मिथिला ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए किए गए योगदान और दान को भारत कभी नहीं भूल पाएगा। शिक्षा, संस्कृति, संविधान और राष्ट्र रक्षा से जुड़े उनके योगदान आज भी इतिहास के स्वर्णिम अध्याय हैं। देश के संविधान निर्माण में भी दरभंगा राज की अहम भूमिका रही। वर्ष 1950 में गठित संविधान सभा के कुल 284 सदस्यों में महाराज कामेश्वर सिंह और महारानी कामसुंदरी देवी दोनों सदस्य थे। वे वर्ष 1947 से 1950 तक संविधान सभा के सदस्य रहे। बताया जाता है कि संविधान की मूल प्रति पर हस्ताक्षर करते समय महाराज कामेश्वर सिंह ने ‘दरभंगा’ का नाम भी अंकित किया था। महाराज कामेश्वर सिंह 1907 से 1962 तक बिहार क्षेत्र से संविधान सभा के एकमात्र सदस्य रहे। खास बात यह भी मानी जाती है कि संविधान सभा के सदस्यों में महारानी कामसुंदरी देवी, सदस्यों की पत्नियों में अंतिम जीवित सदस्य थीं। उनके निधन के साथ ही भारतीय राजशाही की एक अंतिम जीवित निशानी भी समाप्त हो गई।

महारानी कामसुंदरी देवी द्वारा दान किए गए दिल्ली स्थित दरभंगा हाउस में आज देश की राजधानी में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) का मुख्यालय संचालित होता है। वहीं दरभंगा का नरगौना पैलेस ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय को दान किया गया, जहां आज विश्वविद्यालय का पीजी विभाग संचालित है। यह भवन कभी महाराज का आवास हुआ करता था और अपने समय में भूकंपरोधी, एयर कंडीशनर और लिफ्ट जैसी अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित था। पटना में स्थित दरभंगा हाउस को पटना विश्वविद्यालय के लिए दान किया गया। इलाहाबाद और बनारस में भी विश्वविद्यालयों के लिए बड़ा दान दिया गया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) को 50 लाख रुपये का दान महाराज कामेश्वर सिंह द्वारा दिया गया था। इसके अलावा दरभंगा मेडिकल कॉलेज के लिए भवन और भूमि भी राज परिवार ने दान की। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान जब देश संकट में था, तब महाराज कामेश्वर सिंह ने दरभंगा के इंद्र भवन मैदान में आयोजित सभा में तीन विमान और करीब 600 किलो सोना राष्ट्र को दान में दे दिया था।

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इसी दौरान दरभंगा में 90 एकड़ में बने एयरपोर्ट को भी सरकार को सौंप दिया गया। महाराज कामेश्वर सिंह ने देश के महान वैज्ञानिक डॉ. सी. वी. रमन को उनकी पढ़ाई और शोध के लिए एक बहुमूल्य हीरा दान में दिया था। प्राच्य विद्या के संरक्षण के लिए उन्होंने अपने दूसरे आवास को संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में समर्पित किया, जो आज कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है। राज परिवार कला, संगीत और संस्कृति का भी बड़ा संरक्षक रहा। पद्म विभूषण उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और पद्मश्री रामचतुर मल्लिक जैसे महान कलाकार दरभंगा राज के दरबारी रहे हैं। वर्ष 1874 में राज परिवार ने अपने संसाधनों से तिरहुत रेलवे कंपनी की स्थापना की, जिसका मुख्यालय दरभंगा राज परिसर स्थित मोती महल में बनाया गया। इस रेलखंड का निर्माण इंग्लैंड की कंपनी द्वारा कराया गया। वाजितपुर टर्मिनल से नरगौना टर्मिनल तक 55 मील लंबी रेल लाइन मात्र 62 दिनों में तैयार की गई थी। इसी लाइन पर पहली ट्रेन बाजीतपुर से दरभंगा पहुंची। इस रेल नेटवर्क ने पूरे क्षेत्र के विकास में अहम भूमिका निभाई और लोगों को गिरमिटिया मजदूर बनने से भी बचाया। दरभंगा राज और महारानी कामसुंदरी देवी के ये योगदान आज भी देश के सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक इतिहास में अमिट छाप छोड़ते हैं।

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