
पटना: तो क्या बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को कहीं अपने विधायकों का पाला बदलने का डर तो नहीं सता रहा है? राजद के राजनीतिक गलियारों की बात करें तो वर्तमान समय में राजद एक बार टूट की कगार पर दिखने लगा है। एनडीए के रणनीतिकारों के निशाने पर राजद या फिर महागठबंधन के साथी दलों के विधायक हैं। उन्हें पाला बदलने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक आरजेडी को डूबती नाव बताया जा रहा है। बस सही समय का इंतजार है। दरअसल, राजद और कांग्रेस को विधायकों के टूट कर सत्ता पक्ष का दामन थामने की आशंका सता रही है।
वर्ष 2025 के चुनावी जंग में राजद की बुरी हार और महज 25 सीटों पर ही जीत हासिल करना भी नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के लिए सिरदर्द बन चुका है। सरकार बनने से पहले, जब नीतीश ने आरजेडी से नाता तोड़ा था। उस वक्त शक्ति परीक्षण के दौरान विधायक चेतन आनंद,प्रहलाद यादव , सुनीता देवी, विभा देवी विधायक प्रकाश वीर एनडीए की तरफ जाकर उनकी ताकत बढ़ा रहे थे। जबकि यह संख्या एक तिहाई से काफी कम थी। दल बदल कानून के तहत विधायकी जा सकती थी। पर यह तय करना विधानसभा अध्यक्ष को होता है। इस भय से भी नेता प्रतिपक्ष ने हार के कारणों से भागने से बेहतर सामना करना बेहतर समझा। राजद के विधायकों को तोड़ने का खेला सम्राट चौधरी के नेतृत्व में भी हुआ था।
तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समर्थन में सम्राट चौधरी ने 13 विधायक तोड लिए थे। वर्ष 2013 के दौरान नरेंद्र मोदी की पीएम उम्मीदवारी से नीतीश कुमार नाराज चल रहे थे। उस वक्त जदयू के पास 116 विधायक थे। भाजपा से अलग होने के बाद जदयू के लिए सरकार चला पाना मुश्किल था। ऐसे मुश्किल वक्त में कांग्रेस के चार विधायक, चार निर्दलीय विधायक और सीपीआई के इकलौते विधायक जदयू के साथ आ गए। उसी साल जून में फ्लोर टेस्ट में जदयू बहुमत साबित करने में कामयाब हो गया, लेकिन जोखिम की तलवार लटकी हुई थी। इसी जोखिम को खत्म करने के लिए सियासी परिदृश्य में सम्राट चौधरी की नाटकीय एंट्री होती है। तब सम्राट चौधरी ने 13 एमएलए के हस्ताक्षर वाला पत्र राज्यपाल को दिया था।






