Home बिहार बिहार चुनाव में नीतीश फिर फायदे में, कौन है ‘चाणक्य 2.0’?

बिहार चुनाव में नीतीश फिर फायदे में, कौन है ‘चाणक्य 2.0’?

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Nitish Kumar is again in advantage in Bihar elections, who is 'Chanakya 2.0'?

 पटनाबिहार चुनाव के एग्जिट पोल और न्यूज चैनलों पर हो रही डिबेट के बावजूद बिहार एक नई सियासी कहानी का गवाह बन सकता है। सीटों को लेकर गठबंधनों के भीतर खींचतान मची रही। इसी बीच महागठबंधन में सीएम और डिप्टी सीएम चेहरे के ऐलान के बाद ऐसा लग रहा है कि राजद-कांग्रेस वाले इंडिया गठबंधन की जीत की संभावनाएं कम हो गई हैं। ऐसा लगने लगा है कि इस बार का मुकाबला एक त्रिशंकु विधानसभा के रूप में सामने आ सकता है। ऐसा इसलिए कि प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी खुद को NDA और महागठबंधन के बीच एक तीसरी धुरी के रूप में खुद को दिखा रही है। अगर जन सुराज 6% वोट हासिल कर लेता है, तो कम से कम दो दर्जन विधानसभा सीटों पर नतीजे बदल सकते हैं। इससे न सिर्फ NDA बल्कि महागठबंधन के लिए भी मुश्किल हो सकती है। नीतीश कुमार ने दो दशकों से लालू और मोदी दोनों को कभी दूर तो कभी पास रखा है। वो न तो वंशवाद के आगे झुके और न ही राष्ट्रवादी राजनीति की हवा के आगे। उनके इस उलटफेर को, पीछे मुड़कर देखने पर, भ्रम की स्थिति नहीं, बल्कि एक नपी-तुली कार्रवाई के रूप में देखना बेहतर होगा।

2013 में जब उन्होंने एनडीए से नाता तोड़ा था, तो वो कम्युनलिज्म के खिलाफ थे। लेकिन जब 2017 में जब नीतीश ने वापस NDA का रुख किया तो अपने डिप्टी तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद अपने सुशासन रिकॉर्ड को बनाए रखने के लिए। नीतीश का राजनीतिक ब्रांड हमेशा इस बात पर जोर देता रहा है कि बिहार का हित किसी भी एजेंडे से ऊपर रहा है। जब 2005 में नीतीश ने सत्ता संभाली थी, तब बिहार राजनीतिक पतन का प्रतीक था। सूबे में गड्ढों, बिजली की भारी किल्लत और क्राइम का राज था। लेकिन दो दशक बाद अब सीन काफी बदल चुका है। सड़कें दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी हैं। दूर के जिले पटना से बेहद ही तेज रफ्तार वाली सड़कों से जुड़ गए हैं। घरेलु बिजली कनेक्शन जो 2005 में मुश्किल से 25% था, अब 100 फीसदी कवरेज के करीब पहुंच रहा है। लड़कियों के लिए नीतीश की साइकिल योजना ने उनके स्कूल एडमिशन को 37% से बढ़ाकर 60% से ज्यादा कर दिया है। महिलाओं के सशक्तिकरण और शराबबंदी ने नीतीश को एक ब्रांड के तौर पर स्थापित कर दिया।

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नीतीश अपनी सभाओं और सोशल मीडिया हैंडल पर इसे रखने में पीछे नहीं हटते। नीचे आप उनका ऐसा ही एक पोस्ट देख सकते हैं। अब बात प्रशांत किशोर की। कभी पीएम मोदी के लिए तो कभी सीएम नीतीश के लिए कैंपेन चलाने वाले प्रशांत किशोर ने नीतीश के हथियार से ही उनको घेरा है। प्रशांत किशोर उन्हीं वोटरों पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं, जिन्होंने बिहार में 2005 में NDA सरकार बनने में अहम भूमिका निभाई थी। ये वोटर पढ़े लिखे और बुद्धिजीवी तबके के हैं, जिनमें प्रभावशाली जातियां, गैर-यादव ओबीसी और युवा मतदाता हैं। अगर जन सुराज पार्टी को लगभग 6% वोट मिलते हैं, तो एनडीए को दो-तिहाई से तीन-चौथाई तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है, क्योंकि भाजपा का शहरी और युवा आधार सबसे ज्यादा असुरक्षित है। भागलपुर, मुजफ्फरपुर और दरभंगा जैसी शहरी सीटों पर जन सुराज का असर भाजपा के हाथ से सीटें छीन कर महागठबंधन की तरफ बढ़ा सकता है। महागठबंधन को ऐसे में कम नुकसान उठाना पड़ेगा। कुशल रणनीतिकार नीतीश कई परिदृश्यों के लिए तैयारी कर रहे हैं। जनता दल (जदयू) की उनकी रणनीति एक मौन समझौते का भी इशारा दे रही है। अगर भाजपा 60 या उससे कम सीटें जीतती है और नीतीश अपनी 40 के आसपास की संख्या बरकरार रखते हैं, तो पीके का असर साफ़ दिखाई देगा। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि बाद में कोई औपचारिक गठबंधन या, जैसा कि कुछ लोग अनुमान लगा रहे हैं, विलय भी हो सकता है या नहीं। नीतीश सत्ता-विरोधी लहर को ताकत में बदलने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

वे मुख्यमंत्री बने रहने पर अड़े रह सकते हैं। अगर भाजपा इनकार करती है, तो नीतीश एनडीए से बाहर निकल सकते हैं, दिल्ली को दोष दे सकते हैं और बिहार में स्थिरता की जरूरत पर ज़ोर दे सकते हैं। फिर भी, वे तेजस्वी के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन नहीं कर सकते। पीके भी मुख्य रूप से तेजस्वी और राजद पर निशाना साध रहे हैं, न कि वाम दलों या कांग्रेस पर। तेजस्वी के साथ सीधे मुकाबले से पीछे हटने के बावजूद, पीके और नीतीश की साझा रुचि राजद को 60 सीटों से नीचे लाने में है। राजद को भी, भाजपा की तरह, नीतीश की शर्तों पर बातचीत करनी होगी और या तो उनका समर्थन करना होगा या उन्हें तेजस्वी का समर्थन करने के लिए मजबूर करना होगा। इस तरह राज्य की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी 20 साल की सत्ता विरोधी लहर को अपने फायदे का जरिया बना सकती है। इसलिए, नीतीश को सिर्फ पलटू राम समझना असल मुद्दे से भटकना है। एक आधुनिक चाणक्य की तरह, वे लंबी रणनीति अपनाते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि बिहार की राजनीति की कमान न लालू के हाथ में हो और न ही उसे पीएम मोदी संभालें। एक चतुर और व्यावहारिक राजनेता के रूप में नीतीश ने दिल्ली और बिहार के बीच में भी हमेशा संतुलन बना कर रखा है। विरोधी नीतीश कुमार को पलटू कह सकते हैं लेकिन ये भी एक सच है कि वो किंग के साथ किंगमेकर भी हैं। इसमें उनके विकास के काम की अहम भूमिका है।

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