Home बिहार एनडीए की बढ़त कायम: बूथ से सीट तक महागठबंधन रहा पीछे

एनडीए की बढ़त कायम: बूथ से सीट तक महागठबंधन रहा पीछे

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NDA maintains lead: Grand Alliance lags behind from booth to seat

पटना: बिहार की जनता से मिली की अब तक मिले जनादेश ने नीतीश कुमार की NDA सरकार का रास्ता करीब-करीब साफ कर दिया है। इस तरह से NDA के नारे 25 से 30, फिर से नीतीश पर मुहर लग गई। इस जीत का सबसे बड़ा आधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लाभकारी योजनाओं के साथ समग्रता में विकास की बात को जाता है। इस जीत को गति खास कर उन योजनाओं की बरसात ने आसान बना दिया, जिनका ऐलान नीतीश-मोदी की जोड़ी ने चुनाव आचारसंहिता के पहले कर दिया। जानते हैं उन कारणों को जो एनडीए की जीत के बड़े फैक्टर बने। बिहार की जनता ने नीतीश कुमार की अस्वस्थता को एक सिरे से नकार दिया। विपक्ष ने पूरी ताकत इसी में झोंक दी और लगातार कहा कि एक अस्वस्थ मुख्यमंत्री को सत्ता न सौंपें, बल्कि एक युवा को चुनें। बिहार की जनता ने इस आग्रह को अस्वीकार कर एनडीए को और मजबूत कर दिया। साथ ही नीतीश के पक्ष में जमकर वोटिंग कर दी। एनडीए की सरकार ने विभिन्न योजनाओं के जरिए लगभग चार करोड़ लाभुकों का ग्रुप बनाया, वह एनडीए के लिए विनिंग प्लेटफार्म बनाया। इन सभी योजनाओं के लाभुकों ने वोटिंग के दिन अपना दिल खोल दिया और NDA के पक्ष में वोट की बाढ़ ला दी। साल 2025 के चुनाव में आधी आबादी का साथ एनडीए को फिर से जीत के रास्ते पर ले आया।

सच है कि नीतीश कुमार ने लगभग एक करोड़ तीस लाख महिलाओं के खाते में 10 हजार डाल कर उन्हें व्यवसाय में आगे आने का जो संदेश दिया उसे महिलाओं ने स्वीकार किया। जीविका, आशा, ममता के बढ़े मानदेय ने भी महिलाओं का विश्वास और भरोसा जीता। इसके अलावा महिलाओं की नीतीश सरकार पर शराबबंदी, छात्रवृत्ति, नगर निकाय और पंचायत में 50 प्रतिशत आरक्षण और नौकरियों में 35 प्रतिशत आधी आबादी को मिला आरक्षण को ले कर जो विश्वास बना, उस पर महिलाओं ने नीतीश सरकार को वोट के रूप में जमकर आशीर्वाद दे दिया। चुनाव के मौके पर नीतीश कुमार की एनडीए सरकार ने जो बिहार की जनता को 125 यूनिट फ्री बिजली का जो तोहफा दिया, वो भी महागठबंधन के सरकार में आने के सपनों को चकनाचूर कर गया। यह वह तोहफा था जो जाति और धर्म से ऊपर था। यानी सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास।

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पांच पांडव की भूमिका साफ नजर आई। इन पांच पांडव में जदयू, बीजेपी, हम, रालोमो और लोकजनशक्ति पार्टी रामविलास के अपने-अपने जो आधार वोट हैं, उसका सोशल इंजीनियरिंग महागठबंधन के सामाजिक समीकरण पर भारी पड़ा। दरअसल बिहार में पार्टियां जाति के आधार पर बनती हैं और इसीलिए जीत के लिए गठबंधन की राजनीति की शुरुआत बिहार में हुई। इस गठबंधन की राजनीति यानी जातिगत राजनीति का जो फलाफल आया है वह नीतीश कुमार की एनडीए सरकार के पक्ष में आया है। चुनाव प्रबंधन और बूथ प्रबंधन में भी एनडीए महागठबंधन पर हावी रहा। महागठबंधन के साथी दलों की शिकायत भी सामने आई कि बूथ से उनके एजेंट गायब रहे। सीटों की हिस्सेदारी को ले कर एनडीए ने सबसे पहले अपना निर्णय जनता के सामने रख कर महागठबंधन से बढ़त बना ली थी। यह वह समय था जब महागठबंधन में सीटों की हिस्सेदारी को ले कर तनातनी का खेल चल रहा था। उम्मीदवार के चयन को ले कर भी एनडीए ने बढ़त बना ली थी। सबसे पहले 100 फीसदी उम्मीदवारों का परिचय जनता से कराने का श्रेय एनडीए को जाता है।

दूसरी ओर महागठबंधन उम्मीदवारों के नाम को ले कर जूझती रही और अंत में तो कई सीटें ऐसी रही जहां दोस्ताना संघर्ष के नाम पर महागठबंधन के साथी दल आमने-सामने रहे। इसका संदेश जनता के बीच गलत गया जिसका प्रभाव परिणाम में भी दिखा। एनडीए की जीत की भूमिका में विद्रोहियों के दोस्त बन जाने का भी असर चुनाव परिणाम में दिखा। तारापुर में ही जिस तरह से वीआईपी के उम्मीदवार को बीजेपी ने अपना बना लिया, यह रणनीति भी जीत का कारण बनी। एनडीए के हाथ जीत लगी है तो इसका एक छोर कांग्रेस से भी जुड़ता है। कांग्रेस ने बिहार चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया। जिस तरह से पीएम नरेंद्र मोदी बिहार चुनाव में लगातार दौरे करते रहे, इसका फायदा NDA को मिला। लेकिन इसके उलट राहुल गांधी ने उतनी सभाएं नहीं कीं। ये भी कह सकते हैं कि राहुल गांधी ने बिहार चुनाव को ही उतनी गंभीरता से नहीं लिया। जिस तरह से प्रारंभ में राजद की बी टीम से छुटकारे की तड़प कांग्रेस में दिखी, वह बरकरार नहीं रह पाई। इसका फायदा एनडीए को मिला। सवर्ण और दलित वोट जिस तरह से कांग्रेस की तरफ देख रहे थे, उन्हें कांग्रेस के आलाकमान ने ही फिर से NDA की शरण में जाने को मजबूर कर दिया।

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