पटना: बिहार में अगर कोई अपराधी कहता है कि वो खौफ का दूसरा नाम है तो उसके लिए सीधा खौफ बन कर एक पुलिसवाला सामने खड़ा हो जाता है। इस तेवर में कि खूंखार अपराधी भी थर-थर कांपने लगते हैं। एक समय जब ये पुलिस वाला किसी अपराधी के सामने आ जाता था तो उसे अपनी मौत साफ नजर आने लगती थी। वो खाकी वाला किसी से नहीं डरता। गोली का जवाब गोली से देने में रत्ती भर भी नहीं हिचकता। उस आईपीएस का नाम है कुंदन कृष्णन, जिन्हें सरकार ने प्रमोशन देकर DG बना दिया है। जानिए कुंदन कृष्णन के बारे में। नाम से दक्षिण भारतीय लगने वाले कुंदन कृष्णन बिहार के नालंदा जिले के निवासी हैं। 08 मार्च 1969 को उनका जन्म हुआ था। साल 1993 में वो यूपीएसी पास कर IPS के लिए चुने गए थे। इसके बाद 1994 में वो बिहार कैडर में बतौर IPS तैनात किए गए। इसके बाद उनकी पुलिसिंग ने अच्छे-अच्छे अपराधियों में खौफ भर दिया था। साल 2005 में जब नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की बागडोर संभाली थी, तब कुंदन कृष्णन भी उन अफसरों में थे, जिन्होंने लॉ एंड ऑर्डर को दुरुस्त करने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
साल था 2002, तब लालू-राबड़ी शासन काल था। इसी वक्त छपरा की जेल में कैदियों ने दंगा कर दिया था। एक हजार से ज्यादा कैदियों ने (1200 के करीब) जेल पर ही कब्जा कर लिया था। किसी अफसर की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो जेल के अंदर घुस पाए। तभी एंट्री हुई कुंदन कृष्णन की, तनी हुई भौहें और हाथ में AK 47। इसके बाद कुंदन कृष्णन जेल के अंदर घुस गए। वो पूरा सीन किसी एक्शन फिल्म से कम नहीं था। पुलिस को मार डालने पर उतारू 5 कैदी गोली खाकर ढेर हो गए। इस एनकाउंटर में कुंदन कृष्णन के एक हाथ में भी फ्रैक्चर आया लेकिन तब भी उनके हाथ से हथियार नहीं छूटा। इसके बाद सिर्फ एक अफसर के सामने सैकड़ों खतरनाक कैदियों ने सरेंडर कर दिया। साल 2006, तब कुंदन कृष्णन पटना के एसपी सिटी हुआ करते थे। उसी वक्त बाहुबली और सांसद रह चुके आनंद मोहन की देहरादून में एक मामले को लेकर पेशी थी।
आनंद मोहन को सहरसा जेल से देहरादून ले जाया गया। लेकिन इसके बाद वो सहरसा जेल न जाकर पटना के एक होटल में रुक गए। कुंदन कृष्णन को इस बात की खबर लग गई। इसके बाद वो सीधे रेलवे स्टेशन के पास मौजूद उस होटल जा पहुंचे। यहां पर उनकी टीम की भिड़ंत आनंद मोहन के समर्थकों से हो गई। कहा जाता है कि खुद कुंदन कृष्णन से आनंद मोहन भिड़ गए। लेकिन आखिर में इस IPS ने आनंद मोहन को जेल भेज कर ही दम लिया। साल 2005, बिहार में राष्ट्रपति शासन लग चुका था। लालू-राबड़ी की सरकार हाशिए पर थी। तभी कुंदन कृष्णन ने पटना के एसपी के तौर पर अपराधियों के बीच खौफ भर दिया। कहा तो यहां तक जाता है कि उनकी तब की पुलिसिंग के चलते कई अपराधियों ने एनकाउंटर के डर से बिहार ही छोड़ दिया था। गली-गली में पाए जाने वाले डॉन रातों-रात या तो अंडरग्राउंड हो गए या फिर बिहार छोड़ भाग छूटे।
वो साल था 2015, इस खबर के लिखे जाने से ठीक 10 साल पहले 26 दिसंबर की तारीख दरभंगा के बेनीपुर में सरकारी प्रोजेक्ट की सड़क बनवा रहे दो इंजीनियरों ब्रजेश कुमार सिंह और मुकेश कुमार सिंह को AK 56 की गोलियों से भून दिया गया। इसके बाद इस केस में मोस्ट वांडेट मुकेश पाठक का नाम आया (2024 में हाईकोर्ट ने आरोपों से बरी कर दिया था)। इसके बाद मुकेश पाठक नेपाल में जाकर छिप गया। वो रह-रह कर नेपाल और गुजरात में ठिकाने बदल रहा था। तब कुंदन कृष्णन के पुलिसिया दिमाग ने उसे ऐसा छकाया कि मुकेश पाठक STF के हत्थे चढ़ गया। कोलकाता के RG कर मेडिकल कॉलेज रेप केस के दौरान कुंदन कृष्णन केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर CISF में ADG थे। तब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद उन्होंने कॉलेज की सुरक्षा बतौर CISF ADG संभाली थी। कुंदन कृष्णन के करियर की ये तो सिर्फ हाईलाइट्स हैं, कई और ऐसे मामले हैं जिनके बाद जनता का भरोसा पुलिस पर बढ़ गया। अब एक बार फिर से वो अपने मूल कैडर बिहार में हैं और अब वो DG बनाए जा चुके हैं। ऐसे में इस नई सरकार में उनकी भूमिका और खास हो गई है।







