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केके पाठक की फिर चर्चा, शिक्षकों पर सख्ती क्यों नहीं हो रही कम?

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KK Pathak is again in discussion, why is the strictness on teachers not reducing?

पटनाः शिक्षा विभाग से भले पूर्व अपर मुख्य सचिव केके पाठक का साया उठ गया है, पर विभाग का अपने निर्णय से शिक्षकों पर कहर गिराना अभी भी जारी है। शिक्षा विभाग के इस नए फरमान ने शिक्षकों की होश उड़ा दी है। जानिए क्या है वो तुगलकी फरमान जिसने शिक्षकों की बेचैनी बढ़ा दी है। शिक्षा विभाग ने एक फरमान जारी कार्य अब राज्य के सरकारी स्कूलों में कार्यरत सभी कोटि के शिक्षकों को अपनी चल और अचल संपत्ति के साथ-साथ अपने वित्तीय दायित्वों (कर्ज आदि) का पूरा ब्योरा विभाग को सौंपना का निर्देश दिया है। वो भी इस धमकी के साथ कि जो शिक्षक अपनी संपत्ति का विवरण जमा नहीं करेंगे उनका वेतन जारी नहीं किया जाएगा।

हालांकि यह कोई नया नियम नहीं है, पर यह केवल पुराने शिक्षकों के लिए लागू था। पर इस बार यह नियम राज्य के सभी सरकारी शिक्षकों पर समान रूप से प्रभावी होगा। चाहे वो संविदा आधारित शिक्षक हैं या बीपीएससी परीक्षा पास कर आए हैं। इसमें प्रधानाध्यापक, विशिष्ट शिक्षक, विद्यालय अध्यापक और नियोजित शिक्षक सहित सभी कोटि के शिक्षक शामिल हैं। वैसे तो सरकार की मंशा में कहीं खोट नहीं है। अपरोक्ष रूप से सरकार इस निर्देश के साथ यह जानना चाहती है कि इनके शिक्षक स्कूल से कहीं अन्यत्र जाकर अर्थपार्जन तो नहीं कर रहे हैं। यह शिकायत तो मिलती रही है कि सरकारी शिक्षक स्कूल के समय में खुद तो कोचिंग में जाते ही हैं पर साथ छात्रों को भी ले जाते हैं। इस से शिक्षक अच्छा खासा ऐस उठाते हैं। सरकार संपत्ति का ब्यौरा ले कर ऐसे शिक्षकों पर अंकुश लगाना चाहती है।

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बिहार राज्य शिक्षक संघ के उपाध्यक्ष सुरेश राय कहते हैं कि शिक्षकों को राज्यकर्मी का दर्जा देने के बाद तो यह एक जरूरी निर्देश है। पर राज्य सरकार को इसे विभागीय स्तर पर ही सीमित रखना चाहिए। पब्लिक डोमेन में देना गलत है। प्लस टू संघ के प्रदेश अध्यक्ष कृत्यानंद चौधरी का कहना है कि शिक्षा विभाग का शिक्षकों से संपत्ति का ब्यौरा मांगना गलत नहीं है। पर गलत है शिक्षकों की ओर से अर्जित की गई संपत्ति को सबके लिए ओपन कर देना। तब तो संपत्ति ब्यौरा की जानकारी अपराधियों, गुंडे, अपहरणकर्ताओं के पास भी रहेगी। इस सूचना पर कोई भी शिक्षक जिसके पास पूर्वजों की संपत्ति ज्यादा है, उन पर बैड एलिमेंट का तो खतरा मंडराएगा। इसलिए शिक्षा विभाग को पुनः इस निर्णय पर विचार करने चाहिए।

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