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आलाकमान का फैसला, अल्लावरु की बलि — बिहार प्रभारी बदलने पर उठने लगे सवाल

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High Command's decision, Allavaru's sacrifice - questions raised over change of Bihar in-charge

पटनाबिहार में कांग्रेस ने एक बार फिर से वही किया, जिसके लिए वो जानी जाती है। खैर इस पर बाद में बात होगी। लेकिन पहले बात बिहार कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लावरु की, वो अल्लावरु, जिनकी बिहार चुनाव में 23 अक्टूबर से पहले हनक थी। वो अल्लावरु जिन्होंने पटना एयरपोर्ट पर राजद की बी टीम के जवाब में खुलेआम कहा था कि कांग्रेस बिहार में जनता की ए टीम बन कर काम करेगी। लेकिन अब उन्हें ही किनारे लगा दिया गया है। ये अलग बात है कि कहीं और का पद लिया गया, लेकिन बात तो बिहार से जुड़ेगी ही। कांग्रेस ने कृष्णा अल्लावरु को यूथ कांग्रेस के प्रभारी पद से हटा कर मनीष शर्मा को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी है। इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने खत भी जारी कर दिया है। चर्चा है कि टिकट बंटवारे में लगे आरोप के चलते कृष्णा अल्लावरु पर ये गाज गिरी। लेकिन ये सच नहीं लगता। ऐसा होता तो उनकी विदाई बिहार कांग्रेस के प्रभारी पद से होती, न कि यूथ कांग्रेस के प्रभारी की पोस्ट से।

ऐसे में कोई भी यही सोचेगा कि माजरा क्या है, लेकिन इसके लिए आपको बैकग्राउंड में जाना होगा। बिहार विधानसभा में 2021 का उपचुनाव याद कीजिए। उस समय भक्त चरण दास बिहार कांग्रेस के प्रभारी थे। तारापुर और कुशेश्वरस्थान विधानसभा सीट पर उप चुनाव थे। लेकिन कांग्रेस से बिना बात किए लालू प्रसाद यादव ने अपने उम्मीदवार वहां से उतार दिए। इस पर भक्त चरण दास ने कड़ा स्टैंड लिया तो लालू प्रसाद यादव ने उन्हें भकचोन्हर (बेवकूफ) दास कह दिया। तब तो कांग्रेस के कुछ नेताओं ने खूब हंगामा किया। लेकिन आखिर में कांग्रेस ने दोनों सीटों पर फ्रेंडली फाइट नहीं की। कुल मिलाकर वो पीछे हट गई। इसके कुछ महीने बाद 2023 में उनसे कांग्रेस ने बिहार का प्रभार वापस ले लिया। यानी आलाकमान ने कुल मिलाकर बिहार से भक्तचरण दास को चलता कर दिया और कमान मोहन प्रकाश को दे दी गई।

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भक्त चरण दास से पहले बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान 2020 में शक्ति सिंह गोहिल बिहार कांग्रेस के प्रभारी थे। कहा जाता है कि उस समय गोहिल राजद के सामने सीट बंटवारे पर तन कर खड़े हो गए थे। कांग्रेस को तब के चुनाव में महागठबंधन में 70 सीटों की हिस्सेदारी मिली थी। लेकिन इसमें से वो 19 सीटों पर ही जीत पाई। इसके बाद शिवानंद तिवारी समेत कई नेताओं ने अपनी ही सहयोगी कांग्रेस पर सरकार न बनने का आरोप लगाया। इन नेताओं का कहना था कि अगर कांग्रेस की परफॉर्मेंस सही रहती तो बिहार में महागठबंधन की सरकार होती। अब इसे आलाकमान का दबाव कहिए या हारने की जिम्मेदारी, शक्ति सिंह गोहिल ने जनवरी 2021 में खुद ही अपने बिहार प्रभारी के पद को त्याग दिया। कृष्णा अल्लावरु बिहार के ऐसे तीसरे कांग्रेस प्रभारी हैं, जिनके साथ यही सीन रिपीट होता दिख रहा है।

हालांकि पार्टी में टिकट कटने से नाराज नेताओं ने इसके लिए अल्लावरु को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन सब जानते हैं कि कांग्रेस में टिकट का फैसला दिल्ली दरबार से होता है। लेकिन आखिर में ठीकरा फूटता है बिहार कांग्रेस के प्रभारी पर। ये हम नहीं कह रहे, ऊपर के उदाहरण से ये साफ-साफ पता चल रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो ये कांग्रेस की पुरानी रणनीति है। चुनाव से पहले वो राजद से दो-दो हाथ करने के मूड में आती है। फिर अचानक से पीछे हट जाती है। आखिर में बलि का बकरा बिहार कांग्रेस के वो प्रभारी बनते हैं जो दिल्ली या अन्य राज्यों से लाए जाते हैं। शक्ति सिंह गोहिल, भक्तचरण दास और अब कृष्णा अल्लावरु के साथ भी यही होता दिख रहा है।

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