पटना: फिल्म धुरंधर में भारतीय जासूसों को पाकिस्तान में एक कोवर्ट ऑपरेशन को अंजाम देते हुए दिखाया गया है। लेकिन आज से करीब 500 साल पहले भी जासूसों ने कई बड़े कारनामे किये हैं। अकबर के शासन काल में जासूसों को बरीद कहा जाता था। अकबर के जासूसों ने कैसे साजिशों का पर्दाफाश कर उसकी सत्ता को बचाया था, यह एक दिलचस्प कहानी है। अकबर के शासनकाल में भारत को 12 सूबों (प्रांत) में बाटा गया था। ये सूबे थे- काबुल, लाहौर, मुल्तान, दिल्ली, आगरा, अवध, इलाहाबाद, बिहार, बंगाल, मालवा, अजमेर और गुजरात। इसके बाद खानदेश, अहमदनगर और बरार तीन और सूबे जुड़े। सूबों को जिलों (सरकार) और जिलों को परगना में बांटा गया था। जैसे बिहार सूबा में 7 जिले और 199 परगना थे। सूबे का शासन सूबेदार संभालता था। फौजदार, जिले के सैन्य बल का प्रमुख होता था। कोतवाल नगर की आंतरिक कानून-व्यवस्था संभालने वाला पुलिस अधिकारी होता था। अकबर ने अपने शासन को प्रभावी और मजबूत बनाने के लिए एक प्रतिबद्ध खुफियातंत्र की स्थापना की थी। जासूस के रूप में बरीद और वाकया नवीस तैनात थे। बरीद अकबर के जासूस थे। वाकया नवीस खोजी पत्रकार होते थे। वे सम्राराज्य में घूम-घूम कर छोटी-बड़ी घटनाओं की रिपोर्ट तैयार करते थे। बरीद और वाकया नवीस के पूरे राज्य में अपने सूत्र होते थे। ये सूत्र सामान्य नागरिक, व्यापारी, गश्त लगाने वाले घुड़सवार, सेना और पुलिस के मुलाजिम होते थे।
वाकया नवीस को यह सुनिश्चित करना होता था कि अकबर तक राज्य की निष्पक्ष और सटीक खबरें पहुंचे। वाकया नवीस इतने निष्ठावना होते थे कि कोई अधिकारी या सूबेदार उनकी रिपोर्ट बदलने के लिए दबाव नहीं डाल सकता था। वे सिर्फ अकबर के प्रति उत्तरदायी होते थे। इस रिपोर्ट के आधार पर अकबर अपने शासन की नीतियां बनाता था। बरीद का पद एक जासूस की तरह था। बरीद-ए-मुमालिक गुप्तचर विभाग का प्रमुख होता था। बरीद अपनी पहचान बताये बिना काम करते थे। अगर आधुनिक शब्दों में कहा जाय तो बरीद अंडर कवर एजेंट होते थे। यह पद दिल्ली सल्तनत (1206-1526) के समय से चला आ रहा था। मुगलों ने भी अपने शासन में इस व्यवस्था को बनाये रखा। बरीद गांव, परगना, जिला और सूबे में घूम-घूम कर यह देखता था कि शासन के खिलाफ कहीं कोई साजिश तो नहीं हो रही। वे यह पता लगाते थे कि कौन अधिकारी राजा के प्रति वफादार है और कौन विरोधी है। बरीद यहां तक कि राजमहल में तैनात बड़े दरबारियों, मंत्रियों, सेनापतियों तक की भी जासूसी करते थे कि कहीं बगावत की सुगबुगाहट तो नहीं है। कई बार बरीद कोवर्ट ऑपरेशन के तहत विदेशी सीमा से सटे सूबे में भी जाते थे। अकबर के समय बरीद की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी,यह इस कहानी से साबित हो जाती है।
27 जनवरी 1556 में हुमायूं की मौत हुई थी। बैरम खां हुमायूं का सबसे विश्वासी सेनापति था। हुमायूं बैरम खां को इतना मानता था कि उसने अपनी चचेरी बहन की शादी उससे उससे तय कर दी थी। हुमायूं की मौत के बाद ये शादी हुई थी। इस तरह बैरम खां, अकबर का फूफा था। बैरम खां के युद्ध कौशल से खुश हो कर हुमायूं ने उसे खानखाना (सरदारों का सरदार) का उपाधि दी थी। उस समय अकबर नाबालिग (14) था। राज्य में कहीं विद्रोह न हो जाए इसलिए बैरम खां ने हुमायूं की मौत को छिपाये रखा। उसने बात फैला दी कि हुमायूं बीमार हैं। बैरम खां ने अपने एक वफादार को हुमायूं की वेशभूषा में तैयार किया। दूर से देखने में वह हुमायूं की तरह लगता था। बैरम खां नकली हुमायूं को रोज महल के शह-नशीन (बाल्कनी) में ले आता। लोग देखते तो यह समझते कि बादशाह हुमायूं बीमार हैं लेकिन सही सलामत हैं। बैरम खां ने करीब 15 दिनों के अंदर अपने बरीद और वाकया नवीस को पूरे साम्राज्य में फैला कर आंतरिक और बाह्य सुरक्षा की रिपोर्ट मंगायी। जब सब कुछ ठीक रहा तो उसने 14 फरवरी 1556 को 14 साल की उम्र में अकबर ताजपोशी कर दी। अकबर नया मुगल सम्राट बना और बैरम खां अकबर का संरक्षक और मुख्य सेनापति बना। चूंकि बैरम खां नाबालिग सम्राट का संरक्षक था इसलिए उसके हाथ में बहुत शक्तियां थीं। धीरे-धीरे बैरम खां वफादरी भूल कर खुद एक शक्तिशाली शासक बन बैठा। वह अकबर का फूफा भी था। हुमायूं के समय के कई बरीद और वाकया नवीस अकबर से सहानुभूति रखते थे।
वे बैरम खां की अनुशासनहीनता और अहंकार से बहुत दुखी थे। बैरम खां शासन के अहम फैसले बिना अकबर से पूछे ही लेने लगा। बैरम खां ने अकबर के कुछ करीबी अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया। तब बरीद, बैरम खां की करतूतों का प्रमाण सहित विवरण अकबर को देने लगे। कुछ समय बाद बैरम खां ने अकबर के खर्चों पर नियंत्रण लगा दिया। तब अकबर को लगा वह तो सच में कठपुतली शासक है। सत्ता का असली मालिक तो बैरम खां बन गया है। वह संरक्षक के रूप में चार साल काम कर चुका था। तब अकबर ने अपने विश्वासपात्र बरीद, वाकया नवीस और सैनिकों की मदद से बैरम खां के खिलाफ पुख्ता सबूत इकट्ठा किये। अकबर ने मार्च 1560 के दौरान एक दिन बैरम खां को बुलाया और उसके सामने उसका काला चिट्ठा खोल कर दिखाया। तब तक अकबर 18 साल का हो चुका था। बैरम खां निरुत्तर हो गया। अकबर ने उसे पद से बर्खास्त कर दिया और उसे हज पर जाने का विकल्प दिया। उसके हज पर जाने से यही लगता कि बैरम खां स्वेच्छा से पद त्याग कर हज यात्रा पर जा रहा है। बैरम खां इसके लिए राजी हो गया। इसके बाद बैरम खां हज यात्रा पर निकल पड़ा। इस बीच बैरम खां के खिलाफ कुछ बरीद सक्रिय हो गये। ये अकबर के खास जासूस थे। बैरम खां ने कभी इन पर जुल्म ढाया था।
मक्का जाते समय बैरम खां गुजरात के पाटन में रुका था। उसे पानी का जहाज पकड़ने के लिए बंदरगाह पर जाना था। अकबर के जासूसों (बरीद) ने इस बात की सूचना मुबारक खान लोहानी को दे दी। मुबारक खां लोहानी हेमू (हेमचंद्र विक्रमादित्य) की सेना में था। उसके पिता बहार खां लोहानी हेमू की सेना में एक प्रमुख सेनापति थे। दिल्ली पर वर्चस्व के लिए हेमू और अकबर की सेना में पानीपत के मैदान में दूसरा युद्ध हुआ था। इस युद्ध में बैरम खां ने धोखे से बहार खां लोहानी की हत्या कर दी थी। मुबारक खां लोहानी अपने पिता की हत्या का बदला लेने लिए मौके की ताक में था। अकबर के जासूसों (बरीद) ने जब बैरम खां का लोकेशन बता दिया तो मुबारक खां लोहानी पाटन पहुंचा। मुबारक खां लोहानी के साथ करीब तीस-चालीस पठान लड़ाके थे। बैरम खां पाटन के एक तालाब में नौका विहार कर रहा था। जब शाम की नमाज का वक्त हुआ तो वह किनारे उतरा। उसी समय मुबारक खां लोहानी अपने अफगान संगियों से साथ वहां आया। उसने बैरम खां से गले मिलने का उपक्रम किया और सीने में खंजर घोंप कर उसे मार डाला। जब बैरम खां खून से लथपथ तड़पने लगा तो मुबारक खान ने उससे कहा, तुमने मेरे पिता को भी इसी तरह मारा था, आज मैंने उसका बदला ले लिया। महान कवि रहीम खानखाना इसी बैरम खां के पुत्र थे। बाद में वे अकबर के नवरत्नों में से एक बने।







