
पटना: अधिकांश जेन जी (Gen z) की आखिर जाति (Cast) में रुचि क्यों नहीं है ? जब कि बिहार की पारम्परिक सामाजिक व्यवस्था जाति पर आधारित है। यहां तक कि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं में भी जाति की प्रधानता है। इस व्यवस्था में रहने के बाद भी जेन जी क्यों नहीं पुरानी पीढ़ी की तरह जातिवादी सोच रखती है? इसकी सोच अलग क्यों है ? जेन जी का मतलब है 1997 और 2012 के बीच जन्म लेने वाली पीढ़ी। राजनीतिक परिदृश्य में डिजिटल भागीदारी बढ़ने के कारण जेन जी चुनाव नतीजों को प्रभावित करने में सक्षम है। 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव इस बात का प्रमाण है। एनडीए की ऐसी बंपर जीत (202) का अनुमान किसी ने नहीं लगाया था। खुद एनडीए को भी ऐसी जीत की आशा नहीं थी। लेकिन करिश्मा हो गया। बिहार की लगभग 58 फीसदी आबादी 25 साल से कम उम्र की है। इस बार विधानसभा चुनाव में पहली बार वोट डालने वाले युवाओं की संख्या करीब 14 लाख थी। यानी उनकी उम्र 18 साल से कुछ अधिक रही होगी। इन्होंने चुनाव में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया । इसकी वजह से रिकॉर्डतोड़ वोटिंग हुई।
पहली बार वोट डाल रहे अधिकांश जेन जी ने जाति से ऊपर उठ कर वोट किया। नतीजे चौंकाने वाले रहे। जैसे 1995, 2000, 2005, 2010, 2015 और 2020 में विधानसभा चुनाव जीतने वाले राजद के ललित यादव 2025 में 18 हजार वोटों से चुनाव हार गये। ललित यादव तीन चुनाव मनीगाछी से और तीन चुनाव दरभंगा ग्रामीण सीट से जीते थे। जेन जी (Gen z) डिजिटल दुनिया में रहने वाली पीढ़ी है। इसलिए इसकी सोच अब तक की अन्य पीढ़ियों से बिल्कुल अलग है। वह टेक्नोलॉजी में आगे है। ऑनलाइन दुनिया में विचरण करने के कारण उनके ज्ञान और जानकारी को असीमित विस्तार मिला है। यह पीढ़ी ज्यादा क्रिएटिव है इसलिए बड़े मुद्दों (मानवाधिकार, भ्रष्टाचार, रोजगार, लैंगिक समानता, ग्लोबल वार्मिंग) पर ज्यादा मुखर है। यह जाति के बजाय ज्वलंत समस्याओं पर ज्यादा सोचती है। यह समाज में विविधता को स्वीकार करती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी बात मजबूती से रखती है। आखिर जाति प्रथा कैसे शुरू हुई ? जातिसूचक सरनेम लगाने का चलन कब से शुरू हुआ ? प्राचीन काल में तो सरनेम नहीं लगाया जाता था। अब जैसे रामायण या महाभारत का ही उदाहरण ले लिया जाए। इन ग्रंथों के पात्रों के नाम एकल हैं। जैसे राजा दशरथ। उनके नाम के बाद कोई सरनेम नहीं है। राजा दशरथ के रूप में ही उनकी पहचान है।
इसी तरह उनके चार पुत्रों को राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के रूप में जाना गया। इनके नाम के बाद भी कोई सरनेम नहीं है। इसी तरह महाभारत में गुरु द्रोणाचार्य के नाम के बाद कोई सरनेम नहीं है। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव को भी किसी सरनेम की जरूरत नहीं पड़ी। भारत में पहले वर्ण व्यवस्था थी। जातियों का वर्गीकरण बहुत बाद में हुआ। बौद्ध काल में लोग अपनी विशेषता के आधार पर नाम के साथ उपनाम जोड़ने लगे। लेकिन यह जाति का प्रतीक नहीं था। जैसे अगर कोई चार वेदों का ज्ञाता है तो वह चतुर्वेदी लिखने लगा। मुगलकाल में श्रम के आधार पर नयी जातियों का जन्म हुआ। जैसे कुम्भकार, स्वर्णकार, कर्मकार (करमाकार) आदि। अंग्रेजों के आने के पहले भी भारत में में जाति व्यवस्था थी लेकिन यह संस्थागत और कठोर नहीं थी। प्रोफेसर विधु शेखर ने सरनेम प्रथा पर एक शोध किया है। जब भारत में अंग्रेजों का राज शुरू हुआ तो उन्होंने जाति और सरनेम को संस्थागत रूप देना शुरू किया। अंग्रेज अधिकारियों को प्रशासनिक और कानूनी कामों के लिए यहां के एकल नामों से परेशानी होने लगी तो उन्होंने सरनेम थोपने की शुरुआत की। अंग्रेज इतिहासकारों ने भारतीय राजाओं या चर्चित व्यक्तियों के नाम के साथ उनके कुल-वंश के आधार पर या पेशा के आधार पर सरनेम देने का चलन शुरू किया। खेत के रिकॉर्ड, पुलिस के रिकॉर्ड, स्कूल में नामांकन आदि के लिए भारतीय लोगों को उनके सरनेम बताने के लिए कहा जाने लगा।






