पटना: बिहार विधानसभा चुनाव में पहले चरण के लिए 6 नवंबर को मतदान होना है, जिसके लिए नामांकन भरने के लिए अब मात्र तीन दिन (शुक्रवार, 17 अक्टूबर) बाकी हैं। एनडीए ने औपचारिक रूप से सीट बंटवारे का एलान भी कर दिया है। लेकिन, फिर भी सत्ताधारी गठबंधन में शामिल दल इसको लेकर संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं। दूसरी तरफ विपक्षी महागठबंधन में तो अभी तक तस्वीर भी पूरी तरह साफ नहीं है। गठबंधन के भीतर सियासी तूफान दोनों ही ओर उठा हुआ है। इस तूफान की वजह से उठी सियासी धूल तबतक पूरी तरह से साफ होने की उम्मीद नहीं लगती, जब तक पहले चरण में नाम वापसी की मियाद खत्म नहीं होती, जो कि 20 अक्टूबर है। बिहार में सत्ताधारी एनडीए ने भले ही सबसे पहले सीटों का बंटवारा कर लिया हो, लेकिन गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। सबसे खुलेआम नाराजगी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने जाहिर की। सूत्रों के अनुसार बुधवार तड़के तक बीजेपी के दिग्गजों ने उन्हें मनाने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने यह कहकर सनसनी मचा दी कि ‘नथिंग इज वेल इन एनडीए।’
कहा जा रहा है कि वह महुवा सीट एलजेपी (आर) के खाते में जाने से ज्यादा तिलमिलाए हुए हैं। इसी तरह से ‘हम’के जीतन राम मांझी भी मात्र 6 सीटों से खुश नहीं लग रहे। लेकिन, सूत्रों की मानें तक सबसे बड़ी दिक्कत जेडीयू को लेकर है और नीतीश कुमार बीजेपी के बराबर 101 सीट पाकर बहुत ही बौखला गए हैं। एक सूत्र ने एनबीटी ऑनलाइन से कहा है कि मुख्यमंत्री ने बंटवारे में बड़ा भाई नहीं रह पाने को लेकर पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा को कड़ी फटकार भी लगाई है। एनडीए में जो आग ज्यादातर भीतर ही भीतर सुलगी हुई है, महागठबंधन में वह बार-बार बाहर से भी दिखाई पड़ रही है। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस 60-65 सीटों से कम पर राजी नहीं है तो आरजेडी भी इस बार पिछली बार की तरह उसे ज्यादा सीटें देकर, महागठबंधन की ताकत कमजोर करने के लिए तैयार नहीं हैं। महागठबंधन में तकरार का आलम तो ये है कि खुद आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने जिन दो उम्मीदवारों को टिकट दे दिया था, तेजस्वी यादव ने पटना वापस आकर वह भी छीन लिया।
सीपीआई (एमएल) भी पिछली बार की अपनी स्ट्राइक रेट दिखाकर अपनी दावेदारी को लेकर टस से मस नहीं हो रही।वहीं मुकेश सहनी की वीआईपी और चिराग पासवान के चाचा पशुपति कुमार पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) के लिए भी सीटों की गुंजाइश बहुत बड़ी चुनौती है। सूत्रों का कहना है कि नीतीश ने शायद बीजेपी के बराबर सीटें मिलने को पहले उतना नोटिस नहीं किया, जितना पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव के बयान ने कर दिया। पप्पू यादव ने जेडीयू के संजय झा को लपेटते हुए यह कह दिया था कि उनका नीतीश को फिनिश करने मिशन पूरा हो गया है, क्योंकि इससे एक तरह से बीजेपी बिहार की 243 सीटों में से 142 पर लड़ेगी और जेडीयू को 101 पर ला दिया गया है। दरअसल, उनका दावा है कि चिराग, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा बीजेपी की टीम के तौर पर ही लड़ रहे हैं। इसी के बाद बिहार के सियासी गलियारों में तेजस्वी यादव के खास संजय यादव और नीतीश के बीच कथित डील को लेकर भी खबरें घूमने लगीं। इसके तहत तेजस्वी की ओर से नीतीश को 121 (जेडीयू)-121 (आरजेडी) सीटों पर लड़ने का ऑफर देने की बात है।
हालांकि, सूत्र बता रहे हैं कि नीतीश आरजेडी को 80 से ज्यादा देने की बात पर सहमत नहीं हो रहे और मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर भी समझौता नहीं करना चाहते। अगर नीतीश ने फिर से लालू के साथ जाने का फैसला किया तो बीजेपी की अगुवाई में एनडीए में वीआईपी भी शामिल हो सकती है और कांग्रेस, लेफ्ट, उपेंद्र कुशवाहा आदि का एक तीसरा गठबंधन बन सकता है। हालांकि, मुख्यमंत्री उम्मीदवार का मुद्दा इसकी सबसे कमजोर कड़ी है। बिहार में कांग्रेस की अगुवाई में एक तीसरा गठबंधन बन सकता है, जिसमें उपेंद्र कुशवाहा, पशुपति कुमार पास की पार्टियां शामिल हो सकती हैं। कांग्रेस और आरजेडी के बीच जिस तरह सीटों का तकरार है, उसके बाद कुछ भी कहना मुश्किल है। वहीं बाकी दोनों गठबंधन अपनी-अपनी जगह रह सकते हैं। जिस सूत्र ने हमें एनडीए के अंदर चल रही रस्साकशी की जानकारी दी है, उसी ने एक सबसे प्रबल संभावित सिनेरियो की संभावना भी बताई है। उनके मुताबिक केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह सहयोगियों से डील करने के लिए ही पटना में डेरा डालने वाले हैं।
अगर बीजेपी एक सीट का त्याग कर देती है और वह जेडीयू को दे देती है तो उसके 102 सीटें हो जाएंगी और नीतीश का बड़े भाई होने का गौरव बचा रह सकता। वहीं, बीजेपी के पक्ष में यह बात जाएगी कि उसने गठबंधन धर्म का पालन किया और इसके लिए त्याग करने के लिए भी तैयार रही। वहीं, चिराग 29 में से 2 सीटें कुशवाहा और मांझी के लिए छोड़ सकते हैं। संभवत: महुआ सीट कुशवाहा को मिल सकती है, जिसको लेकर वह ज्यादा बिदके नजर आ रहे हैं। इसी तरह से मांझी को एक और सीट मिल जाएगी तो उनकी भी सारी मायूसी दूर हो सकती है। एनडीए का सबसे संभावित सिनेरियो यही है। उसी तरह से महागठबंधन के दलों के भी आखिरकार मिलकर ही चुनाव लड़ने की संभावना है। क्योंकि, कांग्रेस को पता है कि आरजेडी के बगैर बिहार में उसकी सियासी जमीन कहां है?







