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बीजेपी ने जेडीयू को बराबर सीटें देकर भी खेल दिया बड़ा राजनीतिक दांव

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BJP played a big political gamble by giving equal number of seats to JDU.

पटना: NBT ऑनलाइन ने आपको 8 सितंबर को ही बता दिया था कि NDA में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला फिक्स हो चुका है। हमने आपको साफ-साफ बता दिया था कि बीजेपी और जदयू बराबर सीटों यानी 101-101 पर लड़ेगी और चिराग NDA में सीटें पाने वाले दूसरे नंबर पर होंगे। आप ये खबर यहां क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं लेकिन यहीं से आगे की राजनीति शुरू होते दिख रही है। सियासी गलियारों में ये चर्चा जोर शोर से है कि बीजेपी ने अपना आखिरी दांव चल दिया है। NDA में जो सीट समीकरण तय हुआ है, उसके हिसाब से बीजेपी और जदयू 101-101 सीटों पर लड़ेगी। चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) 29 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

इसके अलावा जीतन राम मांझी की HAM को 6 सीटें मिली हैं। इतनी ही यानि 6 सीटें उपेंद्र कुशवाहा को मिली हैं। यानि कुल मिलाकर 243 सीटों बंटवारे में बीजेपी और जदयू के बाद लोजपा रामविलास दूसरी बड़ी पार्टी बन गई है। चिराग पासवान बीजेपी के साथ रहेंगे। उधर मांझी और कुशवाहा फिलहाल JDU यानी नीतीश कुमार के साथ हैं। हालांकि इस सीट बंटवारे के बाद दोनों ने साफ कर दिया है कि उन्हें ये मंजूर नहीं था, लेकिन गठबंधन की मजबूरी के चलते 6-6 सीटों पर उनके पास मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था। अब यहीं से सियासी गलियारे में प्लान की चर्चा शुरू हो गई। जदयू को 101 सीटें मिली हैं। जीतन राम मांझी को 6 और उपेंद्र कुशवाहा को 6 सीटें मिली हैं। तीनों एक साथ रहेंगे तो भी सभी सीटों पर जीतने के बाद उनके खाते में 101+6+6 यानी 113 सीटें ही रहेंगी।

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ऐसे में ये तीन पार्टियां सभी सीटें जीत कर भी पूर्ण बहुमत नहीं ला सकती हैं। इसके लिए उन्हें बीजेपी और चिराग या इनमें से किसी एक की जरुरत पड़ेगी ही। सियासी गलियारे में ये चर्चा तेजी से फैल गई कि बीजेपी बिहार विधानसभा चुनाव में अपने प्लान का पहला फेज पूरा कर चुकी है। कहा जा रहा है कि चिराग और बीजेपी हर हाल में एक साथ रहेंगे। ऐसे में अगर बीजेपी और चिराग के हिस्सों में आई सीटों को जोड़ें तो 101+29 मिलाकर 130 सीटें होती हैं। ऐसे समझिए कि अगर बीजेपी और चिराग पासवान ने अपने ही दम पर बहुमत के जादुई आंकड़े 122 को छू लिया तो उन्हें नीतीश कुमार की कोई जरुरत नहीं रहेगी। लेकिन इसके लिए उन्हें 7 से ज्यादा सीटों पर हारना नहीं होगा। तभी वो बहुमत के आंकड़ों तक पहुंचेंगे। अब सवाल यही है कि जो चर्चा चल रही है क्या वो वाकई सही है?

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