
औरंगाबाद: सावन के पवित्र माह में भगवान शिव की आराधना के लिए शिवभक्ति की गंगा पूरे देश में प्रवाहित हो रही है। श्रद्धालु खासकर कांवड़ यात्रा पर निकलकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ के जलाभिषेक को जा रहे हैं। देशभर के मंदिरों में जहां एकलिंगी शिव की पूजा-अर्चना हो रही है, वहीं कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहां सहस्त्रलिंगी शिव विराजमान हैं। इनमें बिहार के औरंगाबाद जिले के मदनपुर प्रखंड स्थित उमगा पहाड़ की सुरम्य वादियों में स्थित सहस्त्रलिंगेश्वर महादेव का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का दायित्व भगवान शिव को सौंपा, तब शिव ने मैथुनी सृष्टि के लिए सहस्त्रलिंगी स्वरूप धारण किया। इस स्वरूप में एक बड़े शिवलिंग में हजार छोटे-छोटे शिवलिंग समाहित रहते हैं। इसी कारण उन्हें ‘सहस्त्रलिंगी शिव’ कहा गया।
शिवपुराण के अनुसार देशभर में कुल 12 ज्योतिर्लिंग स्थित हैं – सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकाल, ओंकारेश्वर, केदारनाथ, भीमाशंकर, काशी विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, वैद्यनाथ, नागेश्वर, रामेश्वरम और घृष्णेश्वर। इन सभी के दर्शन से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। लेकिन मान्यता है कि उमगा में सहस्त्रलिंगेश्वर शिव की पूजा करने से एक बार में हजार शिवलिंगों के पूजन का पुण्य प्राप्त होता है। यहां एक बार रुद्राभिषेक करने से हजार रुद्राभिषेक का फल मिलता है। सावन के महीने में हजारों श्रद्धालु उमगा पहाड़ की कठिन चढ़ाई चढ़ते हुए यहां स्थित प्राचीन मंदिर में सहस्त्रलिंगी शिव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भीषण गर्मी, बारिश और दुर्गम रास्ते की परवाह किए बिना शिवभक्त कठिन तप से इस दिव्य स्थल की यात्रा करते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान केवल शिवभक्ति का ही नहीं, बल्कि शक्ति उपासना का भी प्रमुख केंद्र है। उमगा पहाड़ी पर देवी-देवताओं के 52 प्राचीन मंदिरों का समूह है।
मुख्य पुजारी बालमुकुंद पाठक के अनुसार, साधकों का मानना है कि सती के अंगों के 52 खंडों में से अंतिम टुकड़ा इसी स्थल पर गिरा था, इसलिए इसे साधना पीठ भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहीं साधकों को स्वनिर्मित सहस्त्रलिंग मिला, जिसकी स्थापना के बाद 8वीं सदी में राजा भैरवेंद्र ने यहां मंदिर बनवाया था। इस स्थान का संबंध शिव और कामदेव की कथा से भी जोड़ा जाता है। पौराणिक कथा है कि कामदेव ने यहीं पंचपुष्पों के वाण चलाकर भगवान शिव की तपस्या भंग करनी चाही थी। इसी कारण इस स्थान का नाम ‘मदनपुर’ पड़ा, क्योंकि शास्त्रों में कामदेव को ‘मदन’ नाम से भी जाना जाता है। भगवानपुर प्रखंड के उमापुर गांव में भी सहस्त्रलिंगेश्वर शिव का एक प्राचीन मंदिर है, जिसका इतिहास लगभग 1500 वर्ष पुराना बताया जाता है। यहां भी मान्यता है कि एक बार पूजा से हजार बार के पूजन का पुण्य मिलता है।
शलमाला नदी के भीतर हजारों शिवलिंग समूह में नजर आते हैं, जिन्हें विजयनगर साम्राज्य के राजा सदाशिव राय वर्मा ने 1678 से 1718 के बीच निर्मित करवाया था। यहां महाशिवरात्रि पर विशेष पूजा होती है। बढ़ियाखेड़ी शिवालय में स्थित सहस्त्रलिंगी शिव का विग्रह अंग्रेजों के काल में सीवन नदी की खुदाई के दौरान प्राप्त हुआ था। आज यह मंदिर स्थानीय आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर में भी सहस्त्रलिंगी शिव विराजमान हैं। यहां शिवजी का धतूरे की माला से श्रृंगार किया जाता है। उमगा का यह शिवधाम केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष के लिए एक अद्वितीय शैव तीर्थ स्थल है। यहां सहस्त्रलिंगी शिव की पूजा से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह किसी एक तीर्थ के दर्शन से कहीं अधिक फलदायक माना गया है। सावन के पावन महीने में यह स्थान शिवभक्तों की आस्था का महान केंद्र बन जाता है।






