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बिहार चुनाव: बेरोजगारी में गिरावट के दावों पर सवाल, आंकड़ों में नहीं दिखा असर

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Bihar elections: Claims of unemployment decline questioned, data shows no impact

पटना: बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहा है। दूसरे और आखिरी चरण के लिए 11 नवंबर को वोट डाले जाएंगे। इस बीच बेरोजगारी के आंकड़े राज्य में एक जटिल तस्वीर पेश कर रहे हैं। बिहार की कुल बेरोज़गारी दर 2017-18 में 8 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 3 फीसदी हो गई। युवा बेरोज़गारी भी इसी राह पर चली, जो 2018-19 में 31 फीसदी से घटकर 2022-23 में 4.3 प्रतिशत हो गई, और पिछले कुछ वर्षों में फिर से बढ़कर 16 फीसदी हो गई। अब सवाल उठाता है कि बिहार में घटती बेरोजगारी दर के बावजूद राज्य में सुधार क्यों नहीं दिख रहा? पहली नज़र में यह गिरावट राहत भरी लग सकती है, मगर विशेषज्ञों के अनुसार यह तस्वीर अधूरी है।

दरअसल, बिहार की बेरोजगारी दर अब भी राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है। और यह जानना ज़्यादा ज़रूरी है कि राज्य में किस तरह का रोजगार बढ़ा है स्थायी नहीं, अस्थायी और अनौपचारिक। बिहार में नियमित वेतन या वेतनभोगी रोजगार यानी वे नौकरियां जो स्थिर आय, लाभ और कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करती हैं, अभी भी बहुत कम हैं। इस श्रेणी में, बिहार सभी प्रमुख राज्यों में सबसे निचले पायदान पर है। महामारी से पहले ही नियमित वेतन वाली नौकरियों में लोगों की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत थी, जो तब से और भी फिसल गई है। इसका मतलब है कि भले ही पहले से ज्यादा लोग तकनीकी रूप से ‘रोज़गार’ में हों, लेकिन बहुत कम लोगों के पास स्थिर और अच्छा काम है। नियमित नौकरियों के बजाय घरों में काम करना, या मजदूरी करना यानी बिना मासिक वेतन वाले काम बढ़े हैं।

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मजदूरी करने में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है। 2017-18 में बिहार के कार्यबल का लगभग 5 प्रतिशत मजदूर थे। 2023-24 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 21 फीसदी हो गई। इन ‘नौकरियों’ में शायद ही कभी निश्चित घंटे, वेतन या सामाजिक सुरक्षा मिलती है। ये अवसर का नहीं, बल्कि अस्तित्व का संकेत देते हैं। यह बदलाव बताता है कि बिहार की कम बेरोजगारी दर भ्रामक हो सकती है। जो लोग पहले बेरोजगार गिने जाते, वे अब घर के भीतर या अनौपचारिक क्षेत्र में बिना मासिस वेतन के काम कर रहे हैं। ये ‘नौकरियां’ किसी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की निशानी नहीं, बल्कि मजबूरी से किया गया श्रम हैं। यानी आंकड़ों में रोजगार बढ़ा दिखता है, पर असल में यह छिपी हुई बेरोजगारी का मामला है।

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