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बिहार चुनाव: कांग्रेस की ‘दुर्गति’ के बीच दो विधायक बने हीरो, मोदी मैजिक हुआ बेअसर

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Bihar Elections: Amidst Congress's 'misery', two MLAs become heroes, Modi magic fails

पटना/अररिया: भले ही कांग्रेस ने इस वर्ष के विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन किया हो और महागठबंधन के हिस्से के रूप में केवल छह सीटें जीत पाई हों। लेकिन अररिया जिले के फारबिसगंज और पश्चिम चंपारण के चनपटिया में उसकी जीत अलग-अलग कारणों से अहम बन गई है। इस साल कांग्रेस के छह विधायक बने – सीमांचल क्षेत्र से मनोज विश्वास (फारबिसगंज ), आबिदुर रहमान (अररिया), मोहम्मद कमरुल होदा (किशनगंज) और मनोहर प्रसाद सिंह (मनिहारी), साथ ही चंपारण क्षेत्र से अभिषेक रंजन (चनपटिया) और सुरेंद्र प्रसाद (वाल्मीकिनगर)। पार्टी ने कुल 61 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। भारी नाकामी के बावजूद फारबिसगंज और चनपटिया में कांग्रेस के उम्मीदवारों ने वो कर दिखाया जिसकी उम्मीद नहीं थी। मनोज विश्वास और अभिषेक रंजन ने अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में दो बार के भाजपा विधायक विद्या सागर केशरी और उमाकांत सिंह को हराया। दोनों सीटों पर हार भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ा झटका थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दूसरे चरण के मतदान से दो दिन पहले 9 नवंबर को बेतिया में एक रैली को संबोधित किया था, और अन्य जिलों में पहले चरण के मतदान के दिन 6 नवंबर को फारबिसगंज में एक और रैली को संबोधित किया था। पिछले 11 साल से प्रधानमंत्री मोदी की पसंदीदा रैली स्थल, फारबिसगंज में यह झटका ज्यादा गहरा है। 2014 में गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने वहां एक रैली और प्रधानमंत्री के तौर पर 5 और रैलियां संबोधित की थीं। एक भाजपा कार्यकर्ता ने कहा, ‘हमारे केशरी भले ही हार गए, लेकिन यह भाजपा का गढ़ बना हुआ है।’ मनोज विश्वास की जीत खास तौर पर इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि उन्होंने फारबिसगंज में 35 साल से चले आ रहे भाजपा के दबदबे को खत्म कर दिया। 2000 को छोड़कर, जब बसपा के जाकिर हुसैन खान जीते थे, 1990 से भाजपा इस सीट पर लगातार काबिज रही थी। भाजपा के चार उम्मीदवार – मायानंद ठाकुर, लक्ष्मी नारायण मेहता, पदम पराग रेणु और विद्या सागर केशरी – 1990 के बाद से सात बार इस सीट से जीते, जिनमें से तीन-तीन ने दो-दो बार जीत हासिल की।

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कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि मनोज विश्वास की विद्यासागर केशरी पर केवल 221 वोटों से मामूली जीत भी एक अर्से तक असर बनाए रह सकता है। उनका तर्क है कि एनडीए के ढांचे के भीतर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व के बिना भविष्य में भाजपा का प्रभाव कम हो सकता है । 2005 से पहले, राज्य में भाजपा की स्वतंत्र पहुंच सीमित ही थी। वे पूर्व कांग्रेस विधायक सरयू मिश्रा की विरासत की ओर भी इशारा करते हैं , जिन्होंने 1962 से लगातार सात बार सीट जीती थी। कांग्रेस ने अब तक 1952 और 1957 सहित नौ बार फारबिसगंज जीता है। पार्टी के विकसित होते सामाजिक आधार को दर्शाते हुए, मनोज विश्वास अत्यंत पिछड़ी जाति वर्ग से आते हैं और 1952 में चुने गए बोकाई मंडल के बाद उस ब्लॉक से केवल दूसरे विधायक हैं। इसी तरह, चनपटिया में अभिषेक रंजन की जीत इस निर्वाचन क्षेत्र में वोटरों को बदलते मूड को दिखा रही है। कांग्रेस ने 2025 तक इस सीट का 5 बार, समाजवादी और ‘जनता परिवार’ पार्टियों ने चार बार, भाकपा ने तीन बार और भाजपा ने 2000 से 2020 के बीच छह बार प्रतिनिधित्व किया है।

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