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1 अणे मार्ग में जश्न के बीच बिखरे सुर, लालू पर नान्ह जातियों को तरजीह देने का तंज

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Amidst the celebrations at Anne Marg, voices were mixed, with Lalu taking a dig at his preference for smaller castes.

पटना: ‘1991 के लोकसभा चुनाव परिणामों का विश्लेषण करने वाले समाचार पत्रों और टिप्पणीकारों का नाम लेना मेरे लिए मुश्किल है। उनमें से कुछ ने सही उम्मीदवारों को चुनने के लिए मेरे राजनीतिक प्रयासों के लिए किए गए मेरे परिश्रम को श्रेय दिया। कुछ लोगों ने चुनावी नतीजों को जनता के साथ सीधे संवाद करने के लिए मेरे कौशल से जोड़ा। ऐसे भी लोग थे जिन्होंने मेरी चालाक सोशल इंजीनियरिंग को श्रेय दिया कि मैंने मुसलमानों और पिछड़े तबके को एक ब्लॉक के रूप में आगे किया। कई अन्य लोगों ने कहा कि मेरी मजाकिया तरीकों ने मेरे पक्ष में जनता का फैसला सुनाया।’ उपरोक्त स्वीकारोक्ति आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने अपनी जीवनी ‘गोपालगंज से रायसीना’मेरी राजनीतिक यात्रा में की है। इस पुस्तक में लालू यादव ने उस दौर के कुछ अनसुने किस्सों को सामने रखा है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। लालू प्रसाद यादव ने 1991 के चुनाव में मिली जीत के पीछे कई कारणों का उल्लेख किया है। उसमें सबसे बड़ा कारण रहा। उच्च जातियों और नौकरशाहों का अपमान करके गरीबों को उकसाना। इससे गरीब तबका लालू यादव के पक्ष में आ गया। लालू यादव खुद ये स्वीकार करते हैं कि इसी सस्ती लोकप्रियता की बदौलत उन्हें व्यापक समर्थन मिला था।

लालू यादव ने एक घटना का जिक्र कर, उसका उदाहरण दिया है। लालू यादव के मुताबिक लक्ष्मीनिया, जो बाढ़ लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में पुनपुन के एक गांव में उनसे मिली थी। उन्होंने उसे अपने पास बुलाया था। उसने लालू को बताया कि उसकी शादी हो चुकी है। लालू यादव लक्ष्मीनिया के बच्चों को अपनी बाहों में लेते हैं। उन्हें प्यार करते हैं। पार्टी कार्यकर्ता से उसे 200 रुपये देने को कहते हैं। वे बताते हैं कि तुम जब चाहो मुझसे मिल सकती हो। कोई नहीं रोकेगा। अपने बच्चों को स्कूल भेजो। लालू यादव बाद में कार्यकर्ताओं को बताते हैं कि लक्ष्मीनिया को वे तब से जानते हैं, जब से वे पशु चिकित्सा कॉलेज परिसर के चपरासी क्वार्टर में रहते थे। वे मुसहरों की बस्ती में रहती थी। 1980 में वे मुसहरों के साथ मिलकर अपना सुख- दुख बांटते थे। वे उनसे लगातार मिलते थे। उनके पास जो पैसे होते थे। वो दे देते थे। लालू यादव अपनी जीवनी में ये स्वीकार करते हैं कि जब वे 1991 के चुनाव परिणाम के बारे में सोच रहे थे, तो लक्षमीनिया की झलक उनके मन में आई। उन्हें यकीन हुआ कि ऐसी बहुत सी लक्ष्मीनिया ने उनकी पार्टी को वोट दिया है।

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लालू यादव को एहसास हुआ कि कमजोर वर्गों ने एक ही झटके में बड़े लोगों को दरकिनार करके उनके पक्ष में वोट किया है। वे कहते हैं- मैंने लाखों लक्ष्मीनिया को देखा, जो मेरे अंदर अपना बड़ा भाई ढूंढ रही थीं। मेरा दिल उनके हित में लगा रहा। अनेक लक्ष्मीनिया ने 1991 में राज्य में मेरी पार्टी की भारी जीत के लिए वोट दिया था। मैंने चुनाव दर चुनाव हमारी पार्टी की जीत में लक्ष्मीनिया अवधारणा को समझाने के लिए ‘जिन्न’ शब्द का इस्तेमाल किया। मैं चुनावों के बाद एलान करता था ‘बैलेट बॉक्स’ से जिन्न निकलेंगे और हम जीतेंगे। उसके बाद लालू यादव अपने राजनीतिक विरोधियों को लेकर कहते हैं कि उनकी ओर से मेरी पार्टी समर्थकों की ओर से वोट लूटने की बात कही। वो बताते हैं कि ये समझ की कमी थी कि वह बिहार में हमारी जीत का विश्लेषण करने में विफल रहे। जबकि उसी समय जनता दल ने देश के बाकी हिस्सों में बुरा प्रदर्शन किया था। लालू यादव स्वीकारते हैं कि आरएसएस- बीजेपी की मानसिकता वाले कई नेताओं ने आरोप लगाया कि लालू ने नान्ह जातियों को सिर पर चढ़ा रखा है। मान बढ़ा दिया है। एक तरह से वे सही थे।

लेकिन मैं खुथ था कि कमजोर वर्ग सामंती व्यवस्था के खिलाफ बोल रहे थे। ‘गोपालगंज से रायसीना’ में लालू प्रसाद यादव बताते हैं कि मैं सामाजिक परिवर्तन से खुश था। मैंने एक अणे मार्ग पर चैता, बिरहा, सोरठी- बिरिजाभार और सारंगा- सदाबृज के लोक गायकों को आमंत्रित किया। मैं पूरी रात संगीत का आनंद उठाया। अब तक, किसी भी मुख्यमंत्री ने इन छोटे- छोटे लोक गायकों को आधिकारिक निवास पर दुरस्थ इलाकों से आमंत्रित नहीं किया था। और इस तरह मैंने वर्षों अपनी चुनावी जीत का जश्न मनाया। लालू यादव कहते हैं कि 1991 के बाद से ही मैंने मुसहर समुदाया के बच्चों के लिए 300 विशेष स्कूल खोलने का निर्णय किया। इनमें पहला विद्यालय पुनपुन मुसहरी में स्थापित किया गया था। जहां लक्ष्मीनिया रहती थी। मैंने वार्षिक राज्य बजट- 1993-94 का एक बड़ा हिस्सा प्राथमिका शिक्षा के लिए आवंटित किया। मेरी सरकार ने भी अपने कुल बजट का एक बड़ा हिस्सा प्राथमिक शिक्षा के लिए निर्धारित किया। लालू यादव शोषितों और वंचितों के समर्थन के बाद संगीत का महफिल जमाते हुए उस जीत का आनंद लेते हैं।

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