पटना: मुख्यमंत्री Nitish Kumar के राज्यसभा जाने की चर्चा के बाद बिहार की राजनीति में नए सियासी समीकरण बनने की अटकलें तेज हो गई हैं। लंबे समय तक राज्य की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार के सक्रिय राज्य राजनीति से दूर होने की संभावना ने सत्ता और विपक्ष दोनों खेमों में हलचल पैदा कर दी है। खासतौर पर विपक्ष की नजर उस सामाजिक आधार पर टिकी है जिसने पिछले डेढ़ दशक में नीतीश कुमार की राजनीति को मजबूत बनाया।
बिहार में हुए जाति आधारित सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि राज्य की राजनीति में पिछड़े वर्गों की भूमिका बेहद अहम है। सर्वे के अनुसार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की आबादी लगभग 27.13 प्रतिशत और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) करीब 36.01 प्रतिशत है। इस तरह दोनों को मिलाकर राज्य में लगभग 63 प्रतिशत आबादी इन सामाजिक समूहों से आती है। यही कारण है कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए इन वर्गों का समर्थन सत्ता तक पहुंचने की सबसे बड़ी कुंजी माना जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2005 के बाद से नीतीश कुमार ने खासतौर पर अत्यंत पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के बीच मजबूत सामाजिक आधार तैयार किया। पंचायतों में आरक्षण, महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाएं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों ने इस वर्ग में उनकी लोकप्रियता बढ़ाई। यही कारण है कि यह वर्ग लंबे समय तक Janata Dal (United) की सबसे बड़ी ताकत माना गया।
हालांकि एक समय यह सामाजिक आधार Rashtriya Janata Dal के साथ भी जुड़ा हुआ था। लेकिन समय के साथ राजनीतिक समीकरण बदलते गए। अब जब नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा हो रही है, तो विपक्ष को उम्मीद है कि यह सामाजिक आधार फिर से राजनीतिक रूप से सक्रिय और विभाजित हो सकता है।
इसी रणनीति के तहत नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav हाल के बयानों में भाजपा पर हमला करते हुए भी नीतीश कुमार के प्रति नरम रुख अपनाते नजर आए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले चुनावों में यही 63 प्रतिशत पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा वोट बैंक बिहार की सत्ता का भविष्य तय कर सकता है।







