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छठ के बाद प्रवासी वोटरों को साधने की होड़, आंकड़ों ने बढ़ाई BJP और RJD की टेंशन

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After Chhath, the race to woo migrant voters is on, the figures have increased the tension for BJP and RJD.

पटना: बिहार में विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल बढ़ती जा रही है। इधर राजनीतिक दलों को छठ महापर्व के बाद प्रवासी मतदाताओं के संभावित पलायन की चिंता सता रही है। बिहार के लगभग 46 लाख लोग राज्य से बाहर काम करते हैं। छठ के नौ दिन बाद पहले चरण का मतदान (6 नवंबर को) और 14 दिन बाद दूसरा चरण (11 नवंबर को) है, ऐसे में आशंका है कि पर्व के बाद ये प्रवासी मजदूर वोट डालने से पहले ही काम पर लौट जाएंगे। बिहार सरकार के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 45.78 लाख निवासी अन्य भारतीय राज्यों में काम करते हैं, जबकि 2.17 लाख विदेशों में कार्यरत हैं। इनमें से अधिकांश प्रवासी आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से आते हैं और मौसमी तौर पर काम के लिए पलायन करते हैं। राजनीतिक दल उन निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान कर रहे हैं, जो प्रवासन से सबसे अधिक प्रभावित हैं।

ताकि वहां के वोटर को रोका जा सके। RJD के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने स्वीकार किया कि कुछ सीटों पर करीबी मुकाबले में प्रवासी मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि ‘हम उन्हें छठ के बाद कुछ और दिन रुकने के लिए मनाने की कोशिश कर रहे हैं। कई जिलों में स्थानीय पार्टी इकाइयों को ‘हर एक वोट के मूल्य’ पर जोर देते हुए जागरूकता अभियान चलाने को कहा गया है। कुछ तो प्रवासियों को मतदान केंद्र तक पहुंचने या उनके जाने में देरी करने के लिए लॉजिस्टिक्स सहायता पर भी विचार कर रहे हैं।’ आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक प्रवासन पटना (5.68 लाख), पूर्वी चंपारण (6.14 लाख), सीवान (5.48 लाख), मुजफ्फरपुर (4.31 लाख) और दरभंगा (4.3 लाख) से होता है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इनमें से कितने लोगों के पास वापस अपने घर पर वोट डालने का अधिकार है।इसके अलावा गया, समस्तीपुर, पश्चिम चंपारण और नालंदा में भी बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए बाहर रहते हैं।

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पहले चरण में पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, समस्तीपुर, नालंदा और सिवान शामिल हैं, जबकि दूसरे चरण में गया, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण, जमुई, नवादा और बक्सर की सीटें होंगी। बीजेपी नेता संतोष प्रधान ने स्वीकार किया कि इस बार प्रवासी वोटरों को रोकना चुनौती है। उन्होंने कहा, ‘अगर मतदान दिवाली के दौरान होता, तो ज्यादातर लोग पहले से ही घर पर होते। अब छठ के बाद उन्हें रोक पाना कठिन होगा।’ राजनीतिक विश्लेषक धीरेंद्र कुमार का मानना है कि यह पूरा मामला बिहार में स्थायी रोजगार संकट को उजागर करता है। उनके मुताबिक, ‘राज्य में हर दस में से एक घर प्रवासियों की कमाई पर निर्भर है।

सरकारें रोजगार के लिए उद्योग और स्किल सेंटर की बातें करती हैं, लेकिन पलायन का सिलसिला थम नहीं रहा।’ वे आगे कहते हैं, ‘हर चुनाव में पार्टियां इस मुद्दे को अस्थायी तौर पर उठाती हैं, पर समाधान कोई नहीं करता। इस बार भी कार्यकर्ता रेलवे स्टेशन और बस अड्डों पर लौटते प्रवासियों का स्वागत करते दिखेंगे और उन्हें वोट डालने तक रुकने के लिए कहेंगे।’ विश्लेषक धीरेंद्र कुमार का कहना है कि जो पार्टी अपने प्रवासी समर्थकों को घर पर रोकने में सफल होगी, वही निर्णायक बढ़त हासिल कर सकती है। उन्होंने कहा, ‘इस बार बिहार में छठ सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक पर्व भी बन गया है।’

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