आंध्र प्रदेश: आंध्र प्रदेश में तिरुपति लड्डू विवाद राजनीतिक तापमान बढ़ाता दिख रहा है। हाल ही में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने एसआईटी जांच के तहत आरोप पत्र दाखिल किया, जिसमें दावा किया गया कि तिरुमाला मंदिर के प्रसाद में कथित मिलावट के आरोपों की जांच के दौरान डेयरी विशेषज्ञों और घी निर्माताओं के बीच मिलीभगत पाई गई थी। आरोप पत्र में यह भी कहा गया कि तिरुपति के प्रसाद में इस्तेमाल किए गए मूल पदार्थ घी नहीं बल्कि रासायनिक रूप से संसाधित पामोलिन तेल और अन्य सामग्रियों का मिश्रण था।
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सत्तारूढ़ वाईएसआरसीपी ने कहा कि यह साबित करता है कि पशु वसा के उपयोग के आरोप मूल रूप से झूठे थे। वाईएसआरसीपी नेता आरके रोजा और एम मनोहर रेड्डी ने जोर देकर कहा कि यह मामला धार्मिक दृष्टि से संवेदनशील था और अब एसआईटी जांच ने इस विवाद को समाप्त कर दिया है। उनका दावा है कि जांच से यह स्पष्ट हुआ कि पवित्र लड्डू में किसी प्रकार की मिलावट नहीं हुई थी।
इसके जवाब में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने नायडू के नेतृत्व में जारी किए गए आरोपों का समर्थन दोहराया। टीडीपी ने कहा कि मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने सितंबर 2024 में यह दावा केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि जुलाई 2024 की एनडीडीबी-सीएएलएफ प्रयोगशाला की रिपोर्ट पर आधारित किया था। एनडीडीबी, जिसे संसद अधिनियम के तहत स्थापित किया गया है, और इसकी प्रयोगशाला भारत में फोरेंसिक और खाद्य परीक्षण के लिए उच्चतम मानकों के अनुसार NABL मान्यता प्राप्त है।
टीडीपी का कहना है कि लड्डू घी में पशु वसा के इस्तेमाल को लेकर उठाए गए सवालों का उद्देश्य राजनीतिक रूप से विरोधी दल को कमजोर करना था। वहीं, वाईएसआरसीपी का कहना है कि जांच ने इस दावे को गलत साबित कर दिया है और इससे राज्य में प्रसाद और मंदिर प्रशासन की विश्वसनीयता बरकरार रहती है। इस विवाद ने राजनीतिक दलों के बीच पुराना मतभेद और धार्मिक संवेदनाओं को फिर से उजागर कर दिया है।
कुल मिलाकर तिरुपति लड्डू मामले में चार्जशीट के बाद टीडीपी और वाईएसआरसीपी के बीच राजनीतिक घमासान बढ़ गया है, जिसमें दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलों के साथ जनता और मीडिया के सामने अपने पक्ष को मजबूती से पेश कर रहे हैं।







