
तमिलनाडु में पोंगल पर्व के उल्लास के बीच गुरुवार से तीन दिवसीय पारंपरिक जल्लीकट्टू उत्सव का शुभारंभ हो गया। मदुरै जिले के अवुनियापुरम में आयोजित पहले दिन के कार्यक्रम में हजारों दर्शकों और सैकड़ों प्रतिभागियों ने भाग लिया। बैलों को वाडीवासल से खुले मैदान में छोड़ा गया, जहां युवाओं ने अपनी बहादुरी और कौशल का प्रदर्शन करते हुए उन्हें काबू करने का प्रयास किया। इस रोमांचक आयोजन को तमिलनाडु के मंत्री पी. मूर्ति ने मदुरै जिला कलेक्टर की मौजूदगी में हरी झंडी दिखाकर शुरू किया।
यह उत्सव शुक्रवार को मदुरै के पालामेडु और त्रिची जिले के सूरियूर गांव में आयोजित होगा, जबकि 17 जनवरी को प्रसिद्ध अलंगनल्लूर में इसका समापन कार्यक्रम रखा गया है, जिसका उद्घाटन मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन करेंगे। अलंगनल्लूर का आयोजन देश-विदेश के पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र माना जाता है, जहां हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इस अनूठी परंपरा को देखने पहुंचते हैं।
प्रतियोगिता के दौरान विजेताओं को सोने की अंगूठी, चेन, दोपहिया वाहन, स्टील के बर्तन और अन्य आकर्षक पुरस्कार दिए जाएंगे। जल्लीकट्टू के लिए विशेष नस्ल के बैल पाले जाते हैं, जिन्हें कृषि कार्य में इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि इन्हें परिवार की प्रतिष्ठा और परंपरा के प्रतीक के रूप में रखा जाता है। यह खेल तमिल समाज की वीरता, साहस और सांस्कृतिक गौरव से जुड़ा हुआ है। इतिहासकारों के अनुसार जल्लीकट्टू की परंपरा संगम युग से चली आ रही है और यह ग्रामीण जीवन, खेती-किसानी तथा धार्मिक आस्थाओं से गहराई से जुड़ी है। कई परिवार मन्नत पूरी होने पर मंदिरों में बैल दान भी करते हैं। चार दिवसीय पोंगल उत्सव के साथ जुड़ा यह आयोजन तमिलनाडु की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। अवुनियापुरम, पालामेडु और अलंगनल्लूर जैसे पंचायत कस्बों को हर साल इस अवसर पर भव्य रूप से सजाया जाता है, जहां परंपरा और आधुनिक उत्साह का अद्भुत मेल देखने को मिलता है






