नयी दिल्ली: कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद सुशीला तिरिया का रविवार शाम एम्स भुवनेश्वर में इलाज के दौरान निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं। परिजनों के अनुसार, वह लंबे समय से फेफड़ों के संक्रमण से पीड़ित थीं और स्वास्थ्य में लगातार गिरावट के चलते अस्पताल में भर्ती थीं। उनके निधन की खबर से ओडिशा की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई है, खासकर मयूरभंज और आदिवासी समुदाय के बीच गहरा दुख देखा जा रहा है।
सुशीला तिरिया ओडिशा की उन गिनी-चुनी नेताओं में शामिल थीं, जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने मयूरभंज लोकसभा सीट से दो बार चुनाव जीतकर संसद में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा, वह दो बार राज्यसभा की सदस्य भी रहीं। संसद में रहते हुए उन्होंने आदिवासियों, महिलाओं और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाया और अपनी बेबाक शैली के लिए जानी गईं।
तिरिया को ओडिशा में आदिवासी नेतृत्व की सशक्त आवाज माना जाता था। वह हमेशा जमीन से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहीं और आदिवासी अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण के लिए निरंतर काम करती रहीं। कांग्रेस पार्टी के भीतर भी उनका एक सम्मानित स्थान था और उन्होंने दशकों तक संगठन के लिए निष्ठा और समर्पण के साथ काम किया।
उनके निधन पर कांग्रेस की ओडिशा इकाई के अध्यक्ष भक्त चरण दास सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया। नेताओं ने उन्हें एक ऐसी नेता बताया, जिन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया। विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने भी उनके योगदान को याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।
मयूरभंज और पूरे ओडिशा के लोगों के लिए सुशीला तिरिया सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक और प्रेरणा थीं। आदिवासी समाज के उत्थान में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक निवास पर किए जाने की संभावना है, जहां बड़ी संख्या में समर्थकों और शुभचिंतकों के जुटने की उम्मीद है।







