
नयी दिल्ली: देश में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट स्कैम से निपटने के लिए बैंक और बीमा कंपनियां मिलकर एक नई इंश्योरेंस पॉलिसी लाने की तैयारी कर रही हैं। इस प्रस्तावित पॉलिसी का उद्देश्य उन लोगों को वित्तीय सुरक्षा देना है, जो साइबर अपराधियों द्वारा धमकी देकर या दबाव बनाकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किए जाते हैं। सरकार की पहल पर इस दिशा में गंभीरता से काम हो रहा है और विशेषज्ञों की एक कमेटी इस मॉडल को अंतिम रूप देने में जुटी है।
इस योजना के तहत यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ट्रांजैक्शन के लिए ‘किल स्विच’ जैसे टूल्स को भी शामिल किया जा सकता है, जिससे संदिग्ध लेनदेन को तुरंत रोका जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह पॉलिसी लागू होती है, तो भारत साइबर फ्रॉड के लिए बीमा कवर देने वाला दुनिया का पहला देश बन सकता है। Prudent Insurance Brokers के प्रेसिडेंट तनुज गुलाटी के अनुसार, मौजूदा साइबर इंश्योरेंस पॉलिसियां केवल तकनीकी धोखाधड़ी को कवर करती हैं, लेकिन दबाव में किए गए स्वैच्छिक ट्रांजैक्शन आमतौर पर कवरेज से बाहर रहते हैं।
डिजिटल फ्रॉड की गंभीरता को देखते हुए Supreme Court of India ने हाल ही में ऐसे मामलों को ‘डकैती’ जैसा गंभीर अपराध बताया और केंद्र सरकार को रोकथाम के लिए मानक प्रक्रिया बनाने का निर्देश दिया है। वहीं Reserve Bank of India भी डिजिटल धोखाधड़ी से प्रभावित ग्राहकों को आंशिक मुआवजा देने के लिए नया फ्रेमवर्क तैयार कर रहा है, जिसके तहत पीड़ितों को 85% या अधिकतम 25,000 रुपये तक का रिफंड मिल सकता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2021 से नवंबर 2025 के बीच साइबर अपराधियों द्वारा 52,969 करोड़ रुपये की ठगी हुई, जबकि केवल 2% से भी कम राशि ही पीड़ितों को वापस मिल सकी। नई बीमा पॉलिसी से डिजिटल लेनदेन करने वाले लोगों को अतिरिक्त सुरक्षा मिलने और साइबर अपराध के बढ़ते खतरे को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।






