नई दिल्ली: प्राइवेट नौकरी करने वाले करोड़ों कर्मचारियों के लिए ईपीएफ (EPF) की ब्याज दर में संभावित कटौती की तैयारी चिंता का कारण बन सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईपीएफओ के सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) की मार्च की पहली हफ्ते में होने वाली बैठक में वित्त वर्ष 2025-26 के लिए ईपीएफ पर ब्याज दर 8.25% से घटाकर 8% से 8.20% करने पर विचार किया जा सकता है। यह कदम ईपीएफ के घटते कॉर्पस को रोकने और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए उठाया जा रहा है।
ईपीएफ प्राइवेट सेक्टर कर्मचारियों के लिए एक अनिवार्य सरकारी बचत योजना है। इसमें कर्मचारी अपनी बेसिक सैलरी का 12% योगदान करते हैं, जबकि नियोक्ता भी उतना ही योगदान करता है। नियोक्ता के योगदान में से 8.33% राशि कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) में जाती है। जमा राशि पर ब्याज कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित रखने में मदद करता है, इसलिए ब्याज दर में बदलाव का सीधे कर्मचारियों की बचत पर असर पड़ेगा।
ब्याज दर तय करने की प्रक्रिया में ईपीएफओ की फाइनेंस, इनवेस्टमेंट और ऑडिट कमेटी पहले निवेश पर रिटर्न के आधार पर सिफारिश तैयार करेगी, जिसे CBT के पास भेजा जाएगा। इसके बाद इसे वित्त मंत्रालय की मंजूरी और श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की आधिकारिक नोटिफिकेशन के बाद कर्मचारियों के खातों में ब्याज जमा किया जाएगा।
इसके साथ ही, CBT वेज सीलिंग को भी 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये करने पर विचार कर सकता है। यह सैलरी लिमिट उस बेसिक सैलरी को निर्धारित करती है, जिस पर कर्मचारी के लिए EPF में योगदान अनिवार्य होता है। वर्तमान में यह सीमा 15,000 रुपये है और सुप्रीम कोर्ट ने चार महीने के भीतर इसे समीक्षा करने का निर्देश दिया है। हालांकि, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुड्डुचेरी में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर बोर्ड इस बार ब्याज दर यथावत रख सकता है।
इस प्रस्तावित बदलाव से कर्मचारियों की बचत और भविष्य की योजनाओं पर असर पड़ सकता है, इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कर्मचारी अपने EPF खातों की स्थिति पर नज़र रखें और आवश्यकतानुसार वित्तीय योजना बनाएं।







