मुंबई: देश की सबसे अमीर नगर निकाय मानी जाने वाली बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के चुनाव कई वर्षों के इंतजार के बाद संपन्न तो हो गए, लेकिन मतदान प्रतिशत ने एक बार फिर निराश किया। करीब 74,400 करोड़ रुपये के विशाल बजट वाली इस स्थानीय सरकार के लिए हुए चुनाव में मतदाताओं की भागीदारी उम्मीद से काफी कम रही। विशेष रूप से दक्षिण मुंबई के कोलाबा इलाके में बेहद कम मतदान दर्ज किया गया, जिसने चुनावी जागरूकता और शहरी उदासीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस बार बीएमसी चुनाव में लगभग 55 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जो 2017 के पिछले चुनावों की तुलना में कम है। तब मतदान प्रतिशत 55 फीसदी से कुछ अधिक रहा था। मतदान सुबह 7:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक शांतिपूर्ण ढंग से चला। मुंबई में कुल एक करोड़ तीन लाख से अधिक पंजीकृत मतदाता हैं, लेकिन इनमें से करीब आधे ही बूथों तक पहुंचे। इतनी बड़ी आबादी वाले महानगर में कम मतदान को लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत माना जा रहा है।
सबसे अधिक मतदान भांडुप स्थित वार्ड नंबर 114 में दर्ज किया गया, जहां लगभग 65 प्रतिशत लोगों ने वोट डाला। इसके विपरीत सबसे कम मतदान कोलाबा के वार्ड नंबर 227 में हुआ, जहां मात्र करीब 21 प्रतिशत मतदाता ही मतदान केंद्र पहुंचे। इस वार्ड में कुल 44,036 मतदाता हैं, लेकिन केवल 9,614 लोगों ने ही वोट किया। हैरानी की बात यह है कि कोलाबा से सटे दो अन्य वार्डों में मतदान लगभग 50 प्रतिशत के आसपास रहा, जिससे साफ होता है कि स्थानीय स्तर पर मतदाता जागरूकता और चुनावी माहौल में भारी अंतर रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी जीवन की भागदौड़, चुनावों को लेकर घटती दिलचस्पी, राजनीतिक दलों से मोहभंग और पर्याप्त जनसंपर्क की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। बीएमसी जैसी महत्वपूर्ण संस्था के चुनाव में कम मतदान लोकतांत्रिक भागीदारी को कमजोर करता है। अब जरूरत इस बात की है कि चुनाव आयोग, प्रशासन और राजनीतिक दल मिलकर मतदाताओं में भरोसा और उत्साह जगाने के लिए ठोस कदम उठाएं, ताकि भविष्य में मुंबई जैसे महानगर में लोकतंत्र अधिक मजबूत बन सके।







