
नयी दिल्ली: वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम माने जा रहे ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ के मुद्दे पर भारत ने बड़ा कूटनीतिक संदेश दिया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के हालिया भाषण को 55 देशों के प्रतिनिधियों ने गंभीरता से सुना, जिसे चीन की इस क्षेत्र में बनी बादशाहत को चुनौती देने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। जयशंकर ने साफ शब्दों में कहा कि भविष्य की तकनीक, ऊर्जा संक्रमण और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी इन खनिजों पर किसी एक देश का एकाधिकार वैश्विक जोखिम पैदा करता है।
अपने संबोधन में जयशंकर ने लिथियम, कोबाल्ट, निकल, रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे क्रिटिकल मिनरल्स का जिक्र करते हुए कहा कि इलेक्ट्रिक व्हीकल, सेमीकंडक्टर, सोलर एनर्जी और रक्षा क्षेत्र की आपूर्ति श्रृंखला इन्हीं पर टिकी है। उन्होंने आगाह किया कि मौजूदा समय में इन खनिजों की प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन पर चीन का दबदबा असंतुलन पैदा कर रहा है, जिससे वैश्विक बाजार और देशों की संप्रभुता प्रभावित हो सकती है।
जयशंकर ने 55 देशों से मिलकर एक भरोसेमंद, पारदर्शी और विविध आपूर्ति श्रृंखला तैयार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत इस दिशा में साझेदारी, संयुक्त निवेश और तकनीकी सहयोग के लिए पूरी तरह तैयार है। भारत का लक्ष्य केवल खुद के लिए नहीं, बल्कि साझेदार देशों के साथ मिलकर एक वैकल्पिक और टिकाऊ इकोसिस्टम खड़ा करना है।
विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि क्रिटिकल मिनरल्स सिर्फ व्यापार का मुद्दा नहीं, बल्कि रणनीतिक स्थिरता और वैश्विक भरोसे से जुड़ा विषय है। इसी सोच के तहत भारत ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीकी देशों, लैटिन अमेरिका और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के देशों के साथ सहयोग बढ़ा रहा है।
कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि जयशंकर का यह भाषण चीन की रणनीतिक बढ़त को संतुलित करने की दिशा में एक स्पष्ट संकेत है। 55 देशों की भागीदारी यह दिखाती है कि दुनिया अब एकतरफा निर्भरता से बाहर निकलने के विकल्प तलाश रही है, जिसमें भारत एक अहम भूमिका निभाने को तैयार है।






