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भारत बना विशाल उपभोक्ता बाजार: पीएलआई का लाभ विदेशी ब्रांडों को ज्यादा, स्वदेशी कंपनियां पिछड़ीं

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India has become a huge consumer market: PLI benefits foreign brands more, indigenous companies lag behind

 नई दिल्ली: मोदी सरकार की मेक इन इंडिया और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं ने भारत को दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार के साथ दूसरी बड़ी विनिर्माण अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित किया है। उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्टहोम उपकरणों के क्षेत्र में भारत आज वैश्विक केंद्र बन चुका है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मोबाइल उत्पादन है, जो 2014-15 में 18,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 5.45 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इस तेज वृद्धि में पीएलआई योजना की अहम भूमिका रही है।

हालांकि, इन योजनाओं का सबसे अधिक लाभ विदेशी ब्रांड उठा रहे हैं, जबकि स्वदेशी कंपनियां प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन तो भारत में हो रहा है, लेकिन बौद्धिक संपदा, डिजाइन और कोर तकनीक का स्वामित्व विदेशी कंपनियों के पास है। इससे भविष्य में विनिर्माण के दूसरे देशों में स्थानांतरित होने का खतरा बना रहता है। भारत को वास्तविक विनिर्माण महाशक्ति बनने के लिए मजबूत भारतीय ब्रांड खड़े करने होंगे, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें।

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आईटेल इंडिया के सीईओ अरिजीत तलपात्रा के अनुसार ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन के ब्रांड सरकारी नीतियों का अधिक लाभ ले रहे हैं, जिससे भारतीय निर्माता अपने ही बाजार में कमजोर पड़ रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकारी खरीद में भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता मिले और घरेलू मूल्यवर्धन को मूल्यांकन का मुख्य आधार बनाया जाए। दक्षिण कोरिया और चीन की तरह भारत को भी घरेलू कंपनियों से खरीद को प्रोत्साहित करना चाहिए।

वोबल, डिक्सन और लावा जैसी भारतीय कंपनियां गुणवत्ता मानकों का पालन कर रही हैं और स्थानीय आपूर्ति शृंखला में निवेश भी कर रही हैं, लेकिन सरकारी टेंडरों में सैमसंग, एसर, आसुस जैसे विदेशी ब्रांड बाजी मार ले जाते हैं। भारतीय उद्योग ने मांग की है कि टेंडरों का मूल्यांकन घरेलू मूल्यवर्धन, लाइफसाइकल लागत और दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव के आधार पर हो तथा पारदर्शी नीति के जरिए समान प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की जाए, ताकि आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य वास्तविक रूप ले सके।

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