नयी दिल्ली: भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) वैश्विक व्यापार में भारत की स्थिति को मजबूत करने और टैरिफ संकट को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। यह समझौता भारत का पिछले चार वर्षों में 9वां व्यापार समझौता होगा, जो वैश्विक संरक्षणवाद के बढ़ते दौर में देश की वैश्विक बाजार में पकड़ मजबूत करने की रणनीति को दर्शाता है।
विशेष रूप से कपड़ा, टेक्सटाइल, आभूषण, फार्मास्यूटिकल्स और मशीनरी जैसे श्रम-प्रधान और विनिर्माण आधारित उत्पादों के निर्यात को यह समझौता बढ़ावा देगा। थिंक टैंक GTRI के अनुसार, भारतीय उत्पादों पर औसत ईयू टैरिफ करीब 3.8 प्रतिशत है, लेकिन टेक्सटाइल और कपड़ों जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर यह करीब 10 प्रतिशत है। समझौता इस उच्च टैरिफ के प्रभाव को कम करने और भारत के उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बहाल करने में मदद करेगा।
इसके अलावा, भारतीय आईटी और पेशेवर सेवाओं के लिए यूरोपीय बाजार के दरवाजे खुल सकते हैं, जिससे सेवा निर्यात में भी विस्तार होगा। ईयू के लिए यह FTA आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने और चीन पर निर्भरता घटाने का अवसर प्रदान करेगा। भारत की 4.2 लाख करोड़ डॉलर की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भी इसके लाभार्थ में शामिल होगी।
हालांकि, कुछ संवेदनशील मुद्दे अभी भी लंबित हैं। कृषि और डेयरी को समझौते से बाहर रखा गया है, जबकि ऑटो, शराब और स्पिरिट सेक्टरों में शुल्क कटौती को लेकर भारत सतर्क है। इसके अलावा, ईयू का कार्बन बॉर्डर लेवी, सख्त मानक और सर्टिफिकेशन लागत जैसी गैर-टैरिफ बाधाएं भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौती बने रहेंगे।
अंततः, इस समझौते से भारत को संतुलित लाभ मिलेगा या नहीं, यह कार्बन लेवी, सर्विसेज मोबिलिटी और गैर-टैरिफ बाधाओं के प्रबंधन पर निर्भर करेगा। यदि समझौता सफल हुआ, तो भारत वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ और निर्यात अवसर दोनों मजबूत कर सकेगा।
कुल मिलाकर, India-EU FTA न केवल टैरिफ संकट का समाधान करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक व्यापार में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में एक रणनीतिक हथियार साबित होगा।







