India faces the challenge of diplomatic balance at the BRICS summit.

नयी दिल्ली: भारत में होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय कूटनीति के सामने वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन साधने की बड़ी चुनौती है। भारत मंडपम में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में रूस, चीन, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात समेत कई प्रमुख देशों के नेता एक मंच पर होंगे।

सितंबर 2023 में G20 शिखर सम्मेलन के दौरान रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर आम सहमति बनाने में भारत ने अहम भूमिका निभाई थी। अब BRICS में मध्य पूर्व के तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका के साथ बदलते संबंधों के बीच सभी सदस्य देशों को एक साझा रुख पर लाना नई दिल्ली के लिए कठिन परीक्षा माना जा रहा है।

GNSU Admission Open 2026

KATHA CONCERT KOLKATA

सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अलावा ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, यूएई और सऊदी अरब के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। मध्य पूर्व में बढ़े तनाव के कारण इन देशों के बीच मतभेद BRICS के साझा एजेंडे को प्रभावित कर सकते हैं।

भारत के लिए अमेरिका का रुख भी महत्वपूर्ण है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप BRICS की उन पहलों का विरोध करते रहे हैं, जिन्हें डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने वाला माना जाता है। भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि BRICS का उद्देश्य अमेरिकी डॉलर के विकल्प के रूप में कोई नई मुद्रा बनाना नहीं है।

इस साल मई में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक संयुक्त घोषणापत्र के बिना समाप्त हुई थी। इससे समूह के भीतर मतभेदों की गंभीरता सामने आई थी। ऐसे में भारत के सामने इस बार सभी सदस्य देशों को एक साझा घोषणा पर सहमत कराने की चुनौती होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को BRICS को पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में पेश होने से रोकते हुए अमेरिका, यूरोप, रूस और चीन के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखना होगा। भारत की प्राथमिकता ऐसी सहमति बनाने की होगी जिसे अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले सभी सदस्य देश स्वीकार कर सकें।

भारत की बहुपक्षीय कूटनीति और ‘ग्लोबल साउथ’ पर जोर के बीच BRICS शिखर सम्मेलन नई दिल्ली के लिए अपनी संतुलित विदेश नीति और कूटनीतिक क्षमता दिखाने का महत्वपूर्ण अवसर बन गया है।