वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने देश में पेट्रोलियम उत्पादन, रिफाइनिंग और इससे जुड़ी गतिविधियों को राष्ट्रीय रक्षा के लिए आवश्यक घोषित किया है। इसके लिए उन्होंने शीत युद्ध के दौर के रक्षा उत्पादन अधिनियम के तहत राष्ट्रपति को मिली शक्तियों का इस्तेमाल किया। इस फैसले से तेल परियोजनाओं, पाइपलाइनों और ईंधन भंडारण से जुड़ी योजनाओं को वित्तीय प्रोत्साहन देने का रास्ता खुल सकता है।
सीएनबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति के ज्ञापन में पेट्रोलियम क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियों का उल्लेख किया गया है। इनमें वित्तपोषण की सीमाएं, परियोजनाओं को पूरा करने में लगने वाला लंबा समय, सरकारी अनुमति प्राप्त करने में आने वाली दिक्कतें, बुनियादी ढांचे की बाधाएं और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं।
प्रशासन का यह कदम ऐसे समय में आया है, जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल और ईंधन की आपूर्ति को लेकर दबाव बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद कच्चे तेल और डीजल की कीमतों में तेजी आई है। वहीं, रूसी रिफाइनरियों पर यूक्रेन के हमलों ने भी ईंधन आपूर्ति को प्रभावित किया है।
ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने के लिए अमेरिकी प्रशासन ने रूसी ईंधन की उपलब्धता का भी सहारा लिया है। अक्टूबर की शुरुआत में ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हुए एक समझौते की घोषणा की थी। इसके तहत रूस से अमेरिका और वैश्विक बाजारों में ईंधन की आपूर्ति जारी रखने की योजना बताई गई थी।
ट्रंप के अनुसार, इस योजना के तहत शुरुआती चरण में तीन लाख टन से अधिक ईंधन उपलब्ध कराने, नवंबर में अतिरिक्त पांच लाख टन की आपूर्ति करने और इसके बाद 10 लाख टन ईंधन उपलब्ध कराने की योजना थी। इन आपूर्तियों को आसान बनाने के लिए अमेरिका ने प्रतिबंधों से जुड़ी कुछ पाबंदियों में अस्थायी छूट भी दी।
पेट्रोलियम क्षेत्र को राष्ट्रीय रक्षा की जरूरतों से जोड़ने का फैसला अमेरिकी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और घरेलू उत्पादन तथा बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को गति देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, इसके वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेंगे कि प्रशासन इन शक्तियों का इस्तेमाल किस तरह करता है और संबंधित परियोजनाओं को कितनी तेजी से आगे बढ़ाया जाता है।







