शहर से गांव लौटे संजीव, मसाला कारोबार से बना रहे रोजगार
Sanjeev returns to the village from the city; creates employment through the spice business.

पौड़ी। रोजगार की तलाश में पहाड़ से शहरों की ओर पलायन आम बात है, लेकिन कोट ब्लॉक के कांडई गांव निवासी संजीव बछेती ने शहर में 26 साल बिताने के बाद गांव लौटकर स्वरोजगार की राह चुनी। कोरोना महामारी के दौरान गांव लौटे संजीव ने वापस शहर जाने के बजाय यहीं कारोबार शुरू करने का फैसला किया। आज उनका मसाला कारोबार ‘मांजी मसाले’ के नाम से पहचान बना रहा है और इसके उत्पाद पौड़ी के अलावा टिहरी, देहरादून समेत अन्य शहरों तक पहुंच रहे हैं।

संजीव ने प्रधानमंत्री रोजगार योजना का लाभ लेकर गांव में मसाला यूनिट स्थापित की। शुरुआत हल्दी, मिर्च और धनिया की प्रोसेसिंग से हुई। कारोबार बढ़ने के साथ यूनिट में हरी इलायची, बड़ी इलायची और तेजपत्ता के अलावा मंडुवा, झंगोरा तथा विभिन्न पहाड़ी दालों के उत्पाद भी तैयार किए जाने लगे हैं।

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यूनिट में आसपास के गांवों से कच्चा माल लाया जाता है। इसके बाद उसकी सफाई, पिसाई और पैकिंग का काम स्थानीय स्तर पर ही किया जाता है। इससे पहाड़ी क्षेत्र के स्थानीय उत्पादों को बाजार मिल रहा है और ग्रामीणों को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हो रहे हैं।

संजीव ने अपने कारोबार को केवल परिवार तक सीमित नहीं रखा। यूनिट में चार महिलाएं उत्पादन और मार्केटिंग से जुड़ी हैं, जबकि तीन अन्य लोग उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने में सहयोग कर रहे हैं। उनकी पत्नी और बड़े बेटे की भी कारोबार में सक्रिय भूमिका है। इस तरह करीब आठ लोग प्रत्यक्ष रूप से इस स्वरोजगार गतिविधि से जुड़े हैं।

संजीव के बड़े बेटे अक्षत बछेती ने दिल्ली-एनसीआर से 12वीं तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद शहर में नौकरी करने के बजाय गांव में रहकर पिता के कारोबार में सहयोग करने का फैसला किया। वहीं यूनिट से जुड़ी ग्रामीण महिलाएं कविता देवी और दीप्ति देवी घरेलू जिम्मेदारियों के साथ गांव के पास रोजगार मिलने से संतुष्ट हैं।

मुख्य विकास अधिकारी अशोक जोशी के अनुसार, संजीव को प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत मसाला यूनिट के लिए ऋण मिला, जिसमें 35 प्रतिशत सब्सिडी का लाभ दिया गया। जिला प्रशासन विभिन्न कार्यक्रमों में स्टॉल उपलब्ध कराकर उनके उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने में भी सहयोग कर रहा है।

संजीव का लक्ष्य कारोबार का और विस्तार कर अधिक से अधिक स्थानीय लोगों को रोजगार से जोड़ना है। उनका प्रयास गांव में रहकर स्वरोजगार और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन की संभावनाओं को सामने रखता है।