ठाणे: महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में 40 लाख रुपये की कथित रिश्वतखोरी के मामले में गिरफ्तार CGST के एडिशनल कमिश्नर एवं IRS अधिकारी विनय कुमार कनहेटी, सुपरिटेंडेंट राकेश कुमार सिन्हा और एक निजी व्यक्ति को ठाणे की विशेष अदालत ने रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने CBI की पांच दिन की पुलिस हिरासत की मांग खारिज करते हुए गिरफ्तारी की प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किए जाने की बात कही।
यह मामला एक स्टोन-क्वेरी फर्म से जुड़े GST और रॉयल्टी विवाद से संबंधित है। CBI ने 26 अगस्त को CGST सुपरिटेंडेंट राकेश कुमार सिन्हा के खिलाफ मामला दर्ज किया था। एजेंसी का आरोप था कि मामले को निपटाने के लिए पहले 1.50 करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी गई और बाद में बातचीत के बाद रकम घटाकर 40 लाख रुपये कर दी गई।
CBI के अनुसार, कथित रिश्वत की रकम एक निजी व्यक्ति के जरिए लेने की व्यवस्था की गई थी। एजेंसी ने जाल बिछाकर उस व्यक्ति को 40 लाख रुपये लेते हुए गिरफ्तार किया। इसके बाद CGST के दोनों अधिकारियों को भी मामले में गिरफ्तार किया गया।
जांच के दौरान आरोपियों से जुड़े परिसरों की तलाशी में 43 लाख रुपये नकद और करीब 90 लाख रुपये के आभूषण बरामद होने का दावा CBI ने किया। इसके बाद एजेंसी ने तीनों आरोपियों से पूछताछ के लिए पांच दिन की पुलिस कस्टडी मांगी थी।
गिरफ्तारी के तरीके पर कोर्ट की आपत्ति
विशेष अदालत ने केस डायरी और गिरफ्तारी से जुड़े दस्तावेजों की समीक्षा के बाद पाया कि रिकॉर्ड से यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं होता कि आरोपियों को उनकी गिरफ्तारी के आधार और कारणों की जानकारी उचित तरीके से दी गई थी।
अदालत ने यह भी कहा कि आरोपियों के परिजनों को गिरफ्तारी की सूचना देने से संबंधित प्रक्रिया का भी उचित तरीके से पालन नहीं किया गया। बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला देते हुए गिरफ्तारी की वैधता पर सवाल उठाया था।
पुलिस कस्टडी की मांग भी खारिज
अदालत ने CBI की आगे की हिरासत में पूछताछ की मांग को भी अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने माना कि कथित रिश्वत की रकम पहले ही बरामद की जा चुकी है और आरोपियों के मोबाइल फोन भी एजेंसी के कब्जे में हैं। ऐसे में पुलिस कस्टडी की जरूरत के लिए पर्याप्त आधार सामने नहीं आया।
अदालत ने तीनों आरोपियों को 15-15 हजार रुपये के व्यक्तिगत मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही उन्हें जांच में सहयोग करने और जांच एजेंसी द्वारा बुलाए जाने पर उपस्थित होने को कहा गया है।
गौरतलब है कि अदालत की ओर से गिरफ्तारी को गैरकानूनी मानकर रिहाई का आदेश दिए जाने का अर्थ आरोपों से अंतिम रूप से बरी होना नहीं है। मामले की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकती है।







