Home संपादकीय हंगामे में गुम होती संसद की सार्थकता

हंगामे में गुम होती संसद की सार्थकता

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uproar drowning the purpose of parliament
uproar drowning the purpose of parliament

संसद लोकतंत्र का वह सर्वोच्च मंच है, जहां देश की जनता की आवाज सत्ता तक पहुंचती है और सरकार से उसके कामकाज का हिसाब मांगा जाता है। इसलिए संसद में बीता प्रत्येक मिनट महज संसदीय कार्यवाही का हिस्सा नहीं होता, वह करोड़ों नागरिकों के विश्वास और करदाताओं के धन से जुड़ा होता है। ऐसे में जब संसद का एक पूरा सत्र सार्थक बहस और विधायी कामकाज के बजाय हंगामे, नारेबाजी और राजनीतिक गतिरोध में उलझकर रह जाये, तो सवाल केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष के टकराव का नहीं रहता, बल्कि लोकतंत्र की कार्यसंस्कृति पर उठता है। हाल में संपन्न मानसून सत्र ने इसी चिंता को गहरा किया है। 25 दिनों तक चले इस सत्र में अपेक्षित गंभीर बहस और रचनात्मक विमर्श की तुलना में व्यवधान अधिक दिखाई दिया। लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा की लगभग 39 प्रतिशत रही। लोकसभा में एक भी दिन प्रश्नकाल पूरी तरह नहीं चल सका। यह आंकड़ा इसलिए चिंताजनक है क्योंकि प्रश्नकाल वह संवैधानिक-संसदीय व्यवस्था है जिसके माध्यम से सांसद सरकार से सीधे सवाल करते हैं और कार्यपालिका को जवाब देना पड़ता है। यदि प्रश्न पूछने और उत्तर प्राप्त करने का अवसर ही बार-बार बाधित होगा, तो सरकार की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी?


यहां किसी एक राजनीतिक दल को दोषी ठहराकर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष की आवाज सुने और उसे पर्याप्त अवसर दे। वहीं विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार की नीतियों और फैसलों पर तीखे सवाल उठाये, लेकिन इस विरोध को सदन को ठप करने का माध्यम न बनने दे। बहुमत सत्ता पक्ष को शासन करने का अधिकार देता है, पर उसे असहमति से ऊपर नहीं उठाता। इसी प्रकार विपक्ष को विरोध का अधिकार है, लेकिन संसद को निष्क्रिय करने का अधिकार नहीं। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु असहमति और अव्यवस्था एक-दूसरे के पर्याय नहीं हो सकते। संसद में नारे लगाना और कार्यवाही रोकना तत्काल राजनीतिक संदेश दे सकता है, लेकिन इससे जनता के प्रश्नों का समाधान नहीं होता। किसी मुद्दे पर सरकार को घेरना है, तो उसके लिए बहस से बेहतर लोकतांत्रिक हथियार दूसरा नहीं हो सकता। प्रश्न पूछे जायें, मंत्री जवाब दें, विपक्ष तथ्यों के आधार पर प्रतिवाद करे और देश उस बहस को देखे—यही संसदीय लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा है।

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मानसून सत्र के दौरान राजनीतिक कटुता के कुछ दृश्य विशेष रूप से चिंता पैदा करने वाले रहे। लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद अपरिहार्य हैं, लेकिन मतभेदों का मनभेद में बदल जाना लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए शुभ संकेत नहीं है। सदन में दिनभर तीखी बहस हो सकती है, पर बहस समाप्त होने के बाद संवाद की संभावना बनी रहनी चाहिए। नीट-यूजी पेपर लीक, जंतर-मंतर से जुड़े छात्र आंदोलन, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और राम मंदिर में दान चोरी जैसे मुद्दे भी सत्र में चर्चा के केंद्र में रहे। जंतर-मंतर की घटना को लेकर विपक्ष केंद्रीय गृहमंत्री से जवाब चाहता था। जब गृहमंत्री जवाब देने के लिए तैयार हुए, तब विपक्ष द्वारा उनका वक्तव्य सुनने से इनकार करना भी संसदीय विवेक की कसौटी पर विचारणीय है। सरकार के जवाब से असहमति हो सकती है, लेकिन जवाब सुने बिना उसे खारिज कर देना बहस की संभावना को ही समाप्त कर देता है। लोकतंत्र में उत्तर से असहमति का अधिकार है, उत्तर सुनने से इनकार का नहीं।


फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरा सत्र निष्फल रहा। गतिरोध के बीच कुछ महत्वपूर्ण विधायी काम हुए। विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 दोनों सदनों से पारित हुआ, जिसका उद्देश्य परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर अंकुश लगाना और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करना है। बैंकिंग रिकॉर्ड को नये डिजिटल ढांचे से जोड़ने, जन्म-मृत्यु के विलंबित पंजीकरण को अधिक कठोर बनाने तथा अन्य विधायी और प्रशासनिक सुधारों की दिशा में भी कदम उठाये गये। केरल का नाम विधिवत केरलम किये जाने का निर्णय भी इसी सत्र में हुआ। ये उदाहरण साबित करते हैं कि संसद यदि पूरी क्षमता से चले, तो सीमित समय में भी व्यापक और महत्वपूर्ण काम किया जा सकता है।


यहीं सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—जब संसद चल सकती है, तो उसे बार-बार बाधित क्यों किया जाता है? संसद केवल सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा नहीं है। वह नीति निर्माण, कानून निर्माण और राष्ट्रीय विमर्श का संस्थागत मंच है। किसान की समस्या हो या बेरोजगारी का प्रश्न, शिक्षा की चुनौती हो या महंगाई की चिंता, सीमाओं की सुरक्षा हो या अर्थव्यवस्था की दिशा—देश की गंभीर समस्याओं पर विस्तृत और तथ्यपूर्ण चर्चा संसद में होनी चाहिए। सदन में बिताया गया समय सांसदों का निजी समय नहीं है; यह जनता का समय है। संसदीय परंपराओं की मजबूती केवल नियम पुस्तिका से नहीं आती, बल्कि राजनीतिक संस्कारों से आती है। अतीत में संसद ने अनेक ऐसे दौर देखे हैं, जब सरकार और विपक्ष के बीच तीखे वैचारिक संघर्ष हुए। बहसें कठोर थीं, आरोप-प्रत्यारोप भी होते थे, लेकिन संवाद के दरवाजे बंद नहीं होते थे। आज आवश्यकता उसी राजनीतिक संस्कृति को पुनर्जीवित करने की है, जिसमें विरोध भी हो और विमर्श भी, आलोचना भी हो और समाधान की तलाश भी।


राजनीतिक दलों को अपने भीतर यह प्रश्न उठाना चाहिए कि क्या वे जनता के सामने यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने संसद में उपलब्ध प्रत्येक अवसर का पूरा उपयोग किया? सांसदों को भी स्वयं से पूछना चाहिए कि उन्होंने कितने प्रश्न पूछे, कितनी बहसों में हिस्सा लिया, कितने विधेयकों पर गंभीर अध्ययन किया और अपने क्षेत्र तथा देश की समस्याओं को कितनी प्रभावी ढंग से सदन में उठाया। संसद में हंगामा करना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन सार्थक बहस के लिए तैयारी चाहिए। नारे लगाने के लिए राजनीतिक उत्साह पर्याप्त हो सकता है, मगर कानून बनाने के लिए अध्ययन और दूरदृष्टि जरूरी है। कार्यवाही रोकने के लिए संख्या बल काम आ सकता है, लेकिन लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए संयम, संवाद और विवेक चाहिए।


आजादी की 80वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ते भारत के लिए यह आत्ममंथन का समय है। हमने विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रतिष्ठा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। अब हमारी राजनीतिक संस्थाओं से भी उसी परिपक्वता की अपेक्षा है। लोकतंत्र केवल पांच वर्ष में एक बार मतदान करने से मजबूत नहीं होता। वह तब मजबूत होता है जब नागरिक अपने प्रतिनिधियों से लगातार जवाब मांगते हैं और जनप्रतिनिधि संसद में जनता के प्रश्नों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। जनता को भी यह जानने का अधिकार है कि उसका प्रतिनिधि संसद में कितना सक्रिय रहा, उसने कितने सवाल पूछे, कितनी बहसों में भाग लिया और विधायी कामकाज में उसका कितना योगदान रहा। लोकतंत्र में जवाबदेही केवल सरकार की नहीं, विपक्ष की भी है और अंततः प्रत्येक निर्वाचित प्रतिनिधि की भी।


संसद में हुआ हंगामा किसी दल की जीत नहीं है, वह लोकतंत्र के समय और जनता के विश्वास की सामूहिक क्षति है। संसद चलेगी तो प्रश्न उठेंगे, प्रश्न उठेंगे तो सरकार को जवाब देना होगा, जवाब आयेगा तो उसकी समीक्षा होगी और समीक्षा से बेहतर नीतियां तथा कानून बनेंगे। यही संसदीय लोकतंत्र की वास्तविक जीवनधारा है। जरूरत केवल इतनी है कि सत्ता पक्ष बहुमत के साथ विनम्रता सीखे और विपक्ष विरोध के साथ जिम्मेदारी—तभी संसद सचमुच जनता की आवाज बन सकेगी।

लेखिका : संगीता कुमारी