
नयी दिल्ली: महिला आरक्षण कानून को जल्द लागू करने की केंद्र सरकार की कोशिशों ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। Narendra Modi के नेतृत्व वाली सरकार अब इस कानून को तेजी से लागू करने के विकल्प तलाश रही है, जिससे जनगणना और परिसीमन जैसी लंबी प्रक्रियाओं को अलग किया जा सके। सरकार का मानना है कि इन प्रक्रियाओं में देरी से कानून का क्रियान्वयन लंबे समय तक टल सकता है, वहीं दक्षिणी राज्यों के संभावित विरोध को भी ध्यान में रखा जा रहा है।
हालांकि, Indian National Congress ने इस पहल पर कड़ा रुख अपनाया है। पार्टी अध्यक्ष Mallikarjun Kharge ने स्पष्ट किया है कि बिना सर्वदलीय बैठक के इस मुद्दे पर कोई भी फैसला स्वीकार्य नहीं होगा। उनका कहना है कि जब संसद पहले ही इस कानून को पारित कर चुकी है, तो अब इसके क्रियान्वयन के तौर-तरीकों पर अलग से पहल करना सवाल खड़े करता है।
सरकार की ओर से Kiren Rijiju ने विपक्ष को साथ लाने की कोशिश की है, लेकिन फिलहाल सहमति बनती नहीं दिख रही। सूत्रों के अनुसार, सरकार कानून में संशोधन कर सीटों के रोटेशन का फार्मूला लागू कर सकती है, जिससे हर चुनाव में अलग-अलग सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हों। हालांकि, इससे कई नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर अनिश्चितता बढ़ने की आशंका है।
सबसे बड़ी चुनौती कानूनी है। मौजूदा प्रावधानों के तहत महिला आरक्षण लागू करने से पहले जनगणना और परिसीमन अनिवार्य हैं। इन्हें बदलने के लिए संविधान संशोधन जरूरी होगा, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत चाहिए—जो सरकार के पास अकेले नहीं है।
ऐसे में यह मुद्दा केवल महिला सशक्तिकरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक रणनीति का केंद्र बन गया है। जहां सरकार इसे ऐतिहासिक कदम के रूप में पेश करना चाहती है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी चाल बता रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या दोनों पक्ष किसी सहमति पर पहुंच पाते हैं या यह अहम कानून एक बार फिर अधर में लटक जाता है।






